कितना ख़ामोश यह पानी है

कितना ख़ामोश यह पानी है |सबकी अपनी-अपनी कहानी है | कोई ना जाने इसका राज़,यह कहानी किसी ने ना जानी है | जो दिल में है वह कह दो आज |यहाँ कोई नहीं जो अंतर्यामी है | प्यार, इश्क, मोहब्बत है काफ़ी,ज़िंदगी फानी है, आनी है, जानी है | यह ग़ज़ल अजब है पर मेरी … Continue reading कितना ख़ामोश यह पानी है

करके देख

अपने आप को खुद के हवाले करके देख लिया |अब अपने आप को साक़ी के हवाले करके देख | तू जीता-मरता रहा, किसी और की मर्ज़ी से,अब कुछ नया, कुछ नए तरीके से करके देख | बहुत पी लिए अश्क़ तूने जाम समझकर,अब जान अपनी उस जाम के भरोसे करके देख | कितना कुछ बाकी … Continue reading करके देख

शायद

याद नहीं, स्कूल था या कॉलेज |शायद, कोई एक, या दोनों,शायद, ज़िंदगी ज़िंदा होना सीख रही थी | शायद, पहला प्यार था,शायद, पहला करार था,शायद, धड़कन धड़कना सीख रही थी | उसके नाम का पहला अक्षर याद है |शायद, उसी से बिस्मिल्लाह करता था,शायद, वही मेरी पूजा थी,शायद, परस्तिश इबादत सीख रही थी | हम … Continue reading शायद

ज़यादा मज़ा आया

ज़िंदगी का जब मज़ाक बनाया,ज़यादा मज़ा आया |दर्द-ओ-ग़म का जब मज़ाक बनाया,ज़यादा मज़ा आया | रोने से कुछ नहीं हुआ हासिल,रोने का जब मज़ाक बनाया,ज़यादा मज़ा आया | एक अर्जे से दिल वीरान था |तन्हाई का जब मज़ाक बनाया,ज़यादा मज़ा आया | इश्क़-नफरत, इल्म-गफ़लत, कैफ़ियात-इबादत,दोनों में उलझन थी |दोनों का जब मज़ाक बनाया,ज़यादा मज़ा आया … Continue reading ज़यादा मज़ा आया

एक आम आदमी

वेद पढ़ी, क़ुरान पढ़ी,लोगों की रटाई हुई बातें रटी |पर नहीं कटी,जैसे चाहता था उम्र को | क्यूँ नहीं ? कंकर में है शंकर,यहाँ ख़ुदा, वहां ख़ुदा |सब अंदर है |पता तो था, फ़िर भी,अपनी सिली-सूखी जेब के फटे-गीले नोट,को ज़रिया बनाया | क्यूँ बनाया ? दिन अब कम है,इतने सारे क्यूँ का क्यूँ जवाब … Continue reading एक आम आदमी

मज़ा कुछ और है

फ़िर ट्रेन में लटककर जाने का मज़ा कुछ और है | वह उम्र भी मस्त थी, इस उम्र का मज़ा कुछ और है | रगों में चालीस के कीड़े दौड़ रहे है | मज़ा पहले भी था पर अब मज़ा कुछ और है | शराब की बोतल ही अपना स्विमिंग पूल थी, अब शराब को … Continue reading मज़ा कुछ और है

निर्मम

कुछ आंसूं जो बहे नहीं | कुछ दर्द जो कहें नहीं | सुनाते है कहानी, कहानी बड़ी है निर्मम | अगर दिल में धड़कन बाकी है तो सुनना | अगर इंसानियत में लगन बाकी है तो सुनना | अगर थोड़ी मजाल बाकी है तो सुनना | कहानी बड़ी है निर्मम, अगर कुछ सवाल बाकी है … Continue reading निर्मम

बिछड़ा यार नहीं मिला

मंदिर गया, मस्जिद गया, वेद पड़ी, कुरान रटी, इधर गया, उधर गया, धागा पहना, तावीज़ पहनी, घंटी बजायी, माला जपी, मोमबत्ती जलाई, गुरबानी सुनी, तस्बीह की, सजदा किया, नंगे पैर चला, उजली सोच राखी, कला जादू किया, गंगा नहाया, सबके काम आया, पर बिछड़ा यार नहीं मिला | मंदिर गया, मस्जिद गया, वेद पड़ी, कुरान … Continue reading बिछड़ा यार नहीं मिला

यार भगवान

यार भगवान, प्लीज़ मेरी मान | नहीं जीना बनकर हिंदु-मुसलमान | चला कोई चक्कर एसा, बस जी सकूँ बनकर इंसान | गीता, कुरान मुझे नहीं आती, मैं तो गाता हूँ सिर्फ प्रेम के गान | मुझे तो ना टैग करो धर्मं से, धर्मं के ज्ञान से है सब अज्ञान | यार भगवान्, प्लीज़ मेरी मान … Continue reading यार भगवान

एक नुस्ख़ा है

एक नुस्ख़ा है ! इसका है, उसका है | मगर काम पक्का होगा | आज नहीं तो कल अच्छा होगा | एक नुस्ख़ा है ! गरुड़ की आँख, आदमी की काख, छिपकली की पूछ, पानवाले की मूछ, मंत्री की कुर्सी की टांग, मुर्गे की बांग, संत्री की लाल बत्ती, दुश्मनों की कट्टी, इन सबको एक … Continue reading एक नुस्ख़ा है

बुराई

बुराई आग है | बुराई नाग है | रावण को मारने से बुराई नहीं मरती | कौरवों के खत्म होने से बुराई नहीं खत्म होती | बुराई बीज है | बुराई हमेशा थी, हमेशा रहेगी | बुराई रीत है | बुराई बदतमीज़ है | बुराई संस्कार है, शरीर नहीं | बुराई सोच है, ग़रीब या … Continue reading बुराई

आतंक

काली, बेहाल, ज़िहाल है आतंक | क़यामत का यह हाल है आतंक | कोई रंजिश, कोई मलाल है आतंक | कितना कमीना कमाल है आतंक | ज़िंदा मुर्दों की लाश है आतंक | कोई दरिंदे का काश है आतंक | एक अंधी सी तलाश है आतंक | इंसानियत का सर्वनाश है आतंक |

सालों ! जागो !

सालों ! जागो ! सालों से सो ही रहे हो | बातों में खो ही रहे हो | सालों ! जागो ! आग जो लायी थी हमने, नफ़रत की, वह अब हमें ही जला देगी | वह अब हमें ही दागा देगी | सालों ! जागो ! धंधा बना रखा है, यार, बस सिर्फ एक … Continue reading सालों ! जागो !

एक मुट्ठी राख़

छोटा सा जीवन है, छोड़ो घमंड जब होना है ख़ाक | तुम कौन हो ? एक मुट्ठी राख़ | ना मैं कुछ, ना मेरा कुछ, समझ गया मैं ये बात | मैं कौन हूँ ? एक मुट्ठी राख़ | एक पल में शुन्य हो जायेगा, जो बनता है बेबाक | वह कौन हैं ? एक … Continue reading एक मुट्ठी राख़

रंडी

अगर लगती है यह गाली गंदी, सोचो किस हाल में जीती है रंडी | शाम का वक़त है | मर्द का दिल सख्त है | गालियाँ-शोर और भूखी निगाहें, क्या-क्या नहीं सहती है रंडी ? कभी शिकार है | कभी व्यापार है | कोठे की वह झंकार है | दिन-रात नाचायी जाती है रंडी | … Continue reading रंडी

फ़िल्मी बात

जब दिल से शोले निकलते है, आग के गोले निकलते है, शहेंशाह भी अग्निपथ पर चल निकलता है | सुनसान राहों पर, अपने पैर की ज़ंजीर को, दिल की हथकड़ी को, अपनी ज़िन्दगी का सिलसिला बना लेता है | कोयला से हिरा निकलता है, और अपनी तकदीर ख़ुद बनाता है | ख़ुदा गवाह है ! … Continue reading फ़िल्मी बात

महाभारत

हर युग में, हर शतक में, हर दशक में, हर साल, हर दिन, हर क्षण, महाभारत होती रहेगी । कभी ज़र के लिए, कभी ज़मीन के लिए, कभी औरत के लिए, कभी दौलत के लिए, कभी सच के लिए, कभी गर्व के लिए, कभी लालच के लिए, कभी कुर्सी के लिए, महाभारत होती रहेगी । … Continue reading महाभारत

नाम हर किसी का बदल जाता है

नाम हर किसी का बदल जाता है। शारीर से प्राण निकलते ही इंसान बॉडी बन जाता है। चकाचौंद दुनिया का डूबा तारा नोबॉडी बन जाता है। नाम हर किसी का बदल जाता है। मुसीबत में फसा दोस्त भिखारी बन जाता है। अधिक माल मिलते ही इंसान अधिकारी बन जाता है। नाम हर किसी का बदल … Continue reading नाम हर किसी का बदल जाता है

दादर

जब धड़कने रुक जाए, होश उड जाए, पसीने छुट जाए, शरीर कांप जाए, खून सूख जाए, चैन खो जाए, इज्ज़त का कचरा हो जाए, आँख से समुंदर आ जाए, रग-रग में करंट दौड़ जाये, खून खौल जाए, भूखे भेडिये नज़र आये, क़त्ल करने का मन बन जाए, कोई उम्मीद नज़र ना आये, इंसानियत से भरोसा … Continue reading दादर

मेरा सिर्फ मैं हूँ

चारों और खबर है | कम हुआ इंसानी सब्र है | लोग लड़ रहे है, मर रहे है | हिंदु-मुस्लिम भीड़ रहे है | बच्चे बिगड़ रहे है | मुझे क्या ? मेरा किसी से रिश्ता नहीं | मेरा कोई नहीं | मेरा सिर्फ मैं हूँ | देश में आग लगी है | शराफ़त भाग … Continue reading मेरा सिर्फ मैं हूँ

बस इतना ही ना ?

तो क्या हुआ ? बस इतना ही ना ? कोई नहीं होगा, हम-तुम अकेले जी लेंगे | बस इतना ही ना ? आँगन में फूल कहाँ है ? घर में आँगन कहाँ है ? पर घर ही कहाँ है ? घर के आभास से फ़िलहाल जी लेंगे | बस इतना ही ना ? अपने आप … Continue reading बस इतना ही ना ?

अपनी चीखें मैंने अब तक संभाल के रखीं है

रात काली है | ख़ुदा ! ख़ुदा ! ख़ुदा ! ज़िंदगी गाली है | आग में दिल है | यार ! यार ! यार ! दर्द में दिल है | कुछ तारीखें मैंने अब तक संभाल के रखीं है | अपनी चीखें मैंने अब तक संभाल के रखीं है | तब चुप रहा | चुप … Continue reading अपनी चीखें मैंने अब तक संभाल के रखीं है

यह ज़मीन कितनी भूखी है

कितना बड़ा ज़ख्म दिया गहरा | यह ज़मीन खा गयी यार मेरा | वक़्त की कितनी बद्सलुखी है | यह ज़मीन कितनी भूखी है | ना जाने कितने थे वह कलंदर, सबको ले लिया अपने सीने के अंदर | इसकी अदा कितनी रूखी है | यह ज़मीन कितनी भूखी है | अब नाजाने किसकी बारी … Continue reading यह ज़मीन कितनी भूखी है

आपने फाड़ दी

सुना है के आपने फाड़ दी | एक मिसाल, बेमिसाल गाड़ दी | सब फ़कीरों की निकल पड़ी, ज़रा सी जो आपने जेब झाड दी | अब कोई नहीं होगा ग़म में, आपने ग़म की जड़ उखाड़ दी | कोई ना बचा पुरे मोहल्ले में, अजब, आपने तो सारी लड़कियां ताड़ दी |

नंगी रात में एक कहानी अकेली खड़ी थी

नंगी रात में एक कहानी अकेली खड़ी थी | एकदम नंगी | भीड़ के दिमाग सी नंगी | दरिंदो के सोच सी नंगी | गरीब के छत सी नंगी | बिना चश्मों की आँख सी नंगी | राजकारण सी नंगी | एकदम अकेली | मासूम गरीबी सी अकेली | सच्ची इंसानियत सी अकेली | भूक … Continue reading नंगी रात में एक कहानी अकेली खड़ी थी

जैसा कल रात हुआ था

फ़िर कभी ना हो जग में, जैसा कल रात हुआ था | इतना ना हो परेशान दिल, जैसा कल रात हुआ था | वक़्त कठिन है, राह में फिसलन है | कहीं लुट जाए ना जवानी, जैसा कल रात हुआ था | दुश्मन के पंजे बड़े है, पैने है | गिर मत, संभल | जैसा … Continue reading जैसा कल रात हुआ था

इसलिए यह ग़ज़ल सुनाने आया हूँ

कुछ फुल सुहाने लाया हूँ | तुम्हे मनाने आया हूँ | मैं जानता हूँ के तुम कौन हो, इसलिए यह ग़ज़ल सुनाने आया हूँ | शर्माओगी तो ज़रूर, लाज़मी है | घब्राओगी भी थोडा, शायद ! पर सुरूर तो बोहोत आयेगा जनाब, तुमको, तुमसे थोडा सा चुराने आया हूँ | इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया … Continue reading इसलिए यह ग़ज़ल सुनाने आया हूँ

जादुई प्राणी

सुना है, इस जग में भांति-भांति के प्राणी है | पर मैंने एक जादुई प्राणी देखा है | सच में ! मैंने एक जादुई प्राणी देखा है | पांच साल में एक बार आता है | फ़िर ग़ायब हो जाता | पांच साल के बाद, फ़िर एक बार आता है | मैंने एक जादुई प्राणी … Continue reading जादुई प्राणी

ज़िंदगी यूँ है फसी

हालत पर हमारी आती है उन्हें हँसी | क्या करें ? ज़िंदगी यूँ है फसी | ना है आँखों में आँसू, ना होठों पे हँसी, ना रात को चैन, ना दिन को सुकून | जलाते रहते है अपने दिल का खून | पीसते रहते है अपने आप में हम, दिल वीरान है, सौ है ग़म … Continue reading ज़िंदगी यूँ है फसी

ज़िंदगी से कोई फैसला हुआ ही नहीं

जिसने मुझको चाहा उसका ना हो सका, जिसे मैंने चाहा वह मिला ही नहीं | फिर आगे हौसला हुआ ही नहीं, ज़िंदगी से कोई फैसला हुआ ही नहीं | एक रात जो हर दिन को खा गयी | नाजाने अकस्मात कहाँ से आ गयी ? ऐसा बंजर किया चमकते गुलिस्तां को, दरख्तों पे फिर घोसला … Continue reading ज़िंदगी से कोई फैसला हुआ ही नहीं

ज़िंदगी मुझे तेरा मलाल

ज़िंदगी मुझे तेरा मलाल तो है | मगर मुझे तेरा ख़याल तो है | तूने मेरा ही घर चुना जलाने को, मुझे तुझसे यह सवाल तो है | ज़िंदगी मुझे तेरा मलाल तो है | अँधेरा कब से मेरे इंतज़ार में है | मेरे हाथ में अभी मशाल तो है | ज़िंदगी मुझे तेरा मलाल … Continue reading ज़िंदगी मुझे तेरा मलाल

ज़िंदगी हमे ये कहाँ ले आयी ?

ज़िंदगी हमे यह कहाँ ले आयी ?खुश थे जहाँ से ले आयी |गुज़रे दिनों की धुप थी क़बूल,क्यों बारिश कहाँ से ले आयी ? किसी अटके हुए पल की तरह |किसी माथे की बल की तरह |किसी सवाल-ए-बेहाल की तरह|किसी जले हुए काल की तरह | गोया खींच के वहाँ से ले आयी,खुश थे जहाँ से ले … Continue reading ज़िंदगी हमे ये कहाँ ले आयी ?

यही मेरी रज़ा है

मेरे ख़ुदा, यही मेरी रज़ा है | मेरी माफ़ी ही मेरी सज़ा है | रिहाई में काफी तनहा था, अब यही सज़ा में मज़ा है | सिर्फ एक इशारे ने बदल दिया, क्या खूबसूरत ये फ़िज़ा है ? बना रखी थी दुनिया को रखैल, अब मेरी नियत बिलकुल पाकिज़ा है | पहले एक ही पत्थर … Continue reading यही मेरी रज़ा है

याद है मुझे

याद है मुझे, वह मुलाक़ात आखरी थी | तेरे-मेरे बीच में वह बात आखरी थी | तूने मुझे उठवा लिया दुनिया से, मुझे याद है, वह कायनात आखरी थी | तेरे ख़ल्क़ मैं नागवार ही रहा, तेरी बनायीं हुई मख़लूक़ात आखरी थी | तेरे ही जलवों पर सब लूटा दिया, मुझे याद है, वह इल्तिफ़ात … Continue reading याद है मुझे

या तुम थी ?

यह मेरे बिस्तर पे सिलवटें कैसी, रात का जादू था, या तुम थी ? आ रही है जाबाज़ा दिलरूबा खुशबू, रात का जादू था, या तुम थी ? इत्र से भीगे मोहब्बत में, हर सांस से पिघल गया तन | लोहा पिघल मोम हुआ ज़मीन पर, रात का जादू था, या तुम थी ? कितने … Continue reading या तुम थी ?

वह सपना तेरा था

रंगों से बना एक सपना मेरा था | यक़ीन है, वह सपना तेरा था | लाल उँगलियों से बनायीं था जो चित्र, यक़ीन है, वह सपना तेरा था | हर रंग में मेरे सपने खिल गए | कहीं राह में हम-तुम मिल गए | आँखें बंद करते ही जो सामने आया,यक़ीन है, वह सपना तेरा … Continue reading वह सपना तेरा था

प्रतिष्ठा

कभी सर, कभी ईमान, प्रतिष्ठा | कभी जन, कभी जहान, प्रतिष्ठा | कभी गुर्रोर, कभी हट, कभी अश्लील, कभी मगरूर, कभी मिथ्या, कभी घायल, प्रतिष्ठा | मेरी प्रतिष्ठा, मेरी प्रतिष्ठा | तेरी प्रतिष्ठा, तेरी प्रतिष्ठा | कभी झूठ, कभी कमाल, प्रतिष्ठा | अधनंगे बदन की छवि, प्रतिष्ठा | ज़ुल्मों से दबी, प्रतिष्ठा | राजपूतों के … Continue reading प्रतिष्ठा

उफ़क़ के उस पार

चांदिनी रात है, सोने की कायनात है, एक नया जहान है उस पार | मुस्कुराते दिन है, ख़ुशी के पल है, हर राह की मंज़िल है | उफ़क़ के उस पार | कौन जिये इस बेक़द्र जहान में बेसबब ? जाने कहाँ जाएँ कैसे, कहाँ और कब ? आओ इंसानियत को ले जाते हैं दूर … Continue reading उफ़क़ के उस पार

तुम वही हो ना ?

तुम वही हो ना ? वही हो ना ? जो गीत थी, प्रीत थी | संग थी, तंग थी | आती थी, जाती थी | मेरे दिल तो तडपाती थी | तुम वही हो ना ? वही हो ना ? आँख का नूर, दिल से क्रूर | थोड़ी पास, थोड़ी दूर | कुछ कायर, कुछ-कुछ … Continue reading तुम वही हो ना ?

तुझे मिलने को चाहे यह मन

आज मौसम है सुहाना, आजा करके कोई बहाना | तुझे मिलने को चाहे यह मन, तुझे छूने को चाहे यह मन | आजा, यूँ ना दिल दुखाना, तेरा मर जायेगा दीवाना |तुझे मिलने को चाहे यह मन,तुझे छूने को चाहे यह मन | सुन यह सदा फ़िज़ाओं की, खिला दे मेरी यह ज़िंदगी खिज़ाओं सी … Continue reading तुझे मिलने को चाहे यह मन

तुम ही मिलते तो अच्छा था

जहाँ फुल खिलते है, वहीँ खिलते तो अच्छा था | तुम से ही प्यार किया था, तुम ही मिलते तो अच्छा था | तुम ही हमसफ़र बन कर, साथ चलते तो अच्छा था | तुम से ही प्यार किया था, तुम ही मिलते तो अच्छा था | ज़ख्म जो तेरे प्यार के, जल्दी ही सिलते … Continue reading तुम ही मिलते तो अच्छा था

तुझसे पहले भी

मैंने देखें है कईं ज़माने रंगों के, मैंने हर साल कईं होली खेली थी | तू नहीं मेरे जीवन में पहली, तुझसे पहले भी एक पहेली थी | हर शाम शमा बुझती थी, हर शाम पिघलता था लोहा मेरा | हर शाम बदन की खुशबू आती, हर शाम बिस्तर पर सजता सेहरा मेरा | मैं … Continue reading तुझसे पहले भी

तुझसे मिलने की आरज़ू

तुझसे मिलने की आरज़ू तो बहुत थी, लेकिन, तेरे दरवाज़े तक आये हम औए रुक गए | सीना चौड़ा था तेरे इश्क़ में, लेकिन, मार गुरूर की ऐसी पड़ी के झुक गए | वह सामने बैठा है, मेरा नहीं, लेकिन, क़यामत ऐसी के टूट सब ताल्लुक गए | काम ना आयी सब सीखी तीरंदाज़ी अजब, क़ातिल … Continue reading तुझसे मिलने की आरज़ू

तुझे देखा

कईं बार मैंने तुझे देखा, सोहने यार मैंने तुझे देखा | पर्बत की ऊचाइयों में, समुंदर की गहराईयों में तुझे देखा | जाम-ए-फना-ए-बेखुदी पीकर, पैमाने में तुझे देखा | इसतराब-ए-इंतज़ार में, मैंने हवाओं में तुझे देखा | फूलों की खुशबू में, माहताब की चांदिनी में तुझे देखा | धड़कन और साँसों में देखा, पंछी बन … Continue reading तुझे देखा

तू ही मेरा प्यार

यार, यार, यार, तुही मेरा यार | तू ही मेरी ज़िंदगी, तू ही मेरा प्यार | तेरी नज़रों में क़ैद रहुँ, यही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी ज़िंदगी, तू ही मेरा प्यार | मेरी साँसों में है तेरी खुशबू , तू ही मेरे जीवन का सार | हाथ ना छूटे, साथ न छूटे,तू ही मेरी … Continue reading तू ही मेरा प्यार

तो क्या होता ?

कागज़ के पंख लगा कर, मेरा प्यार वाला पंछी गिरता नहीं तो क्या होता ? तेरी मोहब्बत को बना कर ख़ुदा, लगाया सीने से मैंने खंजर नहीं चुभता तो क्या होता ? हथेली पर लगी मेहँदी, इंसान के जैसे ही फना हो गयी नीली नहीं पड़ती तो क्या होता ? अच्छा होता, सह लेता उनकी … Continue reading तो क्या होता ?

तेरा कुछ

तेरा कुछ जायेगा नहीं, मेरा कुछ रहेगा नहीं | ऐसा क्यों सोचते हो की ज़माना कुछ कहेगा नहीं | आखिर सामने आ ही जायेगा वो कतरा बनकर, पानी ही सही, बह ही जाएगा, कुछ सहेगा नहीं | छलक ही जाएगा घड़ा गर ज़्यादा भरोगे, ऐसा तो होता ही नहीं के कुछ बहेगा नहीं | बात … Continue reading तेरा कुछ

तवायफ़

मैं हुँ तवायफ़, तवायफ़ मेरा नाम | दुनिया में हुँ इसी नाम से बदनाम | यहाँ की सीढ़ियाँ किसी घर में नहीं उतरती, यह बाज़ार और यह कोठा है मेरा इनाम | यह मर्द-ए-बाजार की मिलकियत है मुजरा , बिस्तर का सफर ग़ज़ल और कथक से गुज़रा | मेरे आँगन की मिटटी से बनती देवी … Continue reading तवायफ़

तलाश

सुख की चादर ओढ़े जहाँ ज़िंदगी मुस्कुराये | अरमानों का खून ना हो, हर सपना साकार हो जाए | जहाँ अमन और प्रेम से भरा हो आकाश | एक ऐसे ही जहान की मुझे है तलाश | हम तो जहाँ गए मिली पत्थर की मूरत | देखा तो पाया इंसान में हैवान की सूरत | … Continue reading तलाश

सोचो

सोचो अगर बर्फ काली होती, गंगा खाली होती | कितना मज़ा आता अगर, अमीरी कमज़ोर और गरीबी शक्तिशाली होती | सोचो अगर दिल की जेब खाली होती, ना होठों पर गाली होती | कितना मज़ा आता अगर, पृथ्वी मेरी बीवी और चाँद मेरी साली होती | सोचो अगर पूरी थाली होती, खाने को रोटी रुमाली … Continue reading सोचो

शहर में आपके

सुना है बहुत वफ़ा है शहर में आपके | ऐसा भी क्या जादू है शहर में आपके ? मैंने तो आज़मा ली अपनी किस्मत वहाँ भी, पर संग दिल सनम है शहर में आपके | सुना है वहाँ चांदी के कमल खिलते है | पर वहाँ सादगी भरे चेहरे कम मिलते है | सुना है … Continue reading शहर में आपके

शहर है या चकला ?

जिसको देखो चला आये | यह शहर है या चकला ? खाये-पीये बत्ती बुझाए | यह शहर है या चकला ? जो चाहे वैसे खाये | यह शहर है या चकला ? इसको एक बिस्तर बनाये | यह शहर है या चकला ?

शराबी-शराबी

मुझे शराबी-शराबी मत कहो | आदमी मजबूरी में पीता है | चाहे कितनी भी अग्निपरीक्षा दे दे, दुनिया की नज़र में तो बुरी सीता है | एक ही इंसान हरिउल्लाह मिला था, कलयुग में बेचारा बेताब ही जीता है | तू भी ज्ञानी, मैं भी ज्ञानी, क्या फर्क ? किसी की क़ुरान और मेरी किताब … Continue reading शराबी-शराबी

सलाम मुंबई

सर झुकेगा नही, लहू से नहाकर आएंगे | लोहे की दीवार तोड़ कर, मंज़िल तक पहुँच जायेंगे | इंसानियत है तलवार हमारी, कभी ना हम घबराएंगे | ए ख़ुदा, तेरे घर में अपना नाम-ए-शहर रोशन कर आएंगे | सलाम मुंबई !

रोज़ उनसे मुलाक़ात

रोज़ उनसे मुलाक़ात होती है | कैसे हो अजब — बस यही बात होती है | तर्क-ए-तालुकात ही है लेकिन, ना उनकी, ना हमारी रात सोती है | जहाँ हज़ार दिलों की लाश गिरी हो | वहीँ मोहब्बत की शिनात होती है | मेरा घर मिटटी का है इसलिए, मेरे ही यहाँ बरसात होती है … Continue reading रोज़ उनसे मुलाक़ात

रंज की महक

रंज की महक बहुत नबील होती है | यह बहुत कम लोगों को नसीब होती है | क्या मज़ा जीने में बिना दर्द के ? दर्द की परछाई बड़ी अज़ीम होती है | आज इस महफ़िल में फूल नहीं तो क्या, कांटे ही सही ! क्योंकि फूल तो मुरझा जायेंगे पर कांटे नहीं | काँटों … Continue reading रंज की महक

क़ातिल

हाय ! क़ातिल | अदाएं क़ातिल | जी रहे है हम तो, ना जाने यह हम तो, कब फ़ना हो जाएँ | सदायें क़ातिल | अदाएं क़ातिल | आजा ओढ़ ले, जिस्म में दौड़ ले, किसी को नज़र ना आयें | हवाएं क़ातिल | अदाएं क़ातिल |

प्यार हो जाएगा

खेलो ना दिल से मेरे, शीशा है टूट जाएगा | इतने प्यार से ना देखो मुझे, प्यार हो जाएगा | चलते-चलते राह में वह मिल गया, अच्छा लगा | रुख़्सार पर उसकी परेशानी थी पर सच्चा लगा | उसने मुझे जाना, मैंने उसे, हाँ, शायद वही थी सोचा था जिसे | फिर किस्मत ने वफ़ा … Continue reading प्यार हो जाएगा

पत्ता-पत्ता हिल गया

पत्ता-पत्ता हिल गया | दिल हमारा खिल गया | सजदा-ए-यार में, पैर मेरा छिल गया | फिर उंस की बरसात हुई, बेवफा अपना दिल गया | कोई ऊम्फ सी आज है, लगता है वह मिल गया | उसने यूँ छुआ मुझे, हर ज़ख्म सील गया | जाने क्या क़यामत हुई, वह पत्थर हिल गया | … Continue reading पत्ता-पत्ता हिल गया

नज़र दूर तक जाती है

नज़र दूर तक जाती है, फिर भी लगता है के कुछ बाकी है | सैर-ए-गुलशन तो किये बहुत, अभी सारी कायनात बाकी है | मैं कुछ भूला नहीं, दिल पे उल्फत का निशान अभी बाकी है | अभी तो सिर्फ तूफ़ान आया है दोस्त, क़यामत तो अभी बाकी है | एक सितम और सही, अभी … Continue reading नज़र दूर तक जाती है

नहीं था

आज के दिन का इंतज़ार नहीं था | मुझे भी तुमसे प्यार नहीं था | नातरस ही सुनते थे तुम फरियाद मेरी, तुम्हारे चेहरे पर अबसार नहीं था | मुफ्त में ही तूने मुझे जुगनू बना दिया, मेरी ज़िंदगी में इतना अफसार नहीं था | अच्छी साज़िश करके तूने मुझपर बरसाया, मुझ गरीब पर पास … Continue reading नहीं था

नहीं कर सकते

हम जानते है पर हम वह काम नहीं कर सकते | अब यह हाथ किसी और के लिए नहीं बड़ सकते | हमे खबर है के एक साथ या सहारा चाहिए, पर ये होंठ अब फिर से वही बात नहीं कर सकते | उनकी यादों की सौगात है हमारे पास, पर उन्हें हम जला नहीं … Continue reading नहीं कर सकते

नहीं देखा

कभी कोई नयी ख़ुशी को नहीं देखा | तेरे बाद फिर किसी और को नहीं देखा | सब ही मसरूफ थे अपने भ्रम में, अश्क़-ए-साद को किसी ने नहीं देखा | हर आँखें देख रही थी आतिशबाज़ी, मेरी नज़र की ओर किसी ने नहीं देखा | सिर्फ मशहूर हुए राँझा और महिवाल, मेरी जुर्रत को … Continue reading नहीं देखा

मुअम्मा

मैं भी मुअम्मा, तू भी मुअम्मा | जान भी मुअम्मा, रूह भी मुअम्मा | क्या नाज़ करूँ हाल-ए-ज़ीस्त का ? हक़ीक़त भी मुअम्मा, आरज़ू भी मुअम्मा | रात भी मुअम्मा, बात भी मुअम्मा | ख़ुदा भी मुअम्मा, कायनात भी मुअम्मा | इस जगह का हिसाब कितना अजब है | सब लोग मुअम्मा, हर तरफ़ मुअम्मा … Continue reading मुअम्मा

मुझे प्रश्न करे

मुझे प्रश्न करे नील ध्रुव तारा, और कितने दिन रहूँगा मैं बेसहारा | जवाब कोई भी ना दे सका मैं सिर्फ, राह ढूंढते बीत गया यह जीवन सारा | ना जाने किसने यह प्रीत की लौ जलायी, देख के सूरज की रोशिनी भी शरमाई | अपने ही साये के पीछे घूमता रहा, एक दिन देखा … Continue reading मुझे प्रश्न करे

मुझे नफ़रत है

मुझे नफ़रत है, तेरे होठों के जलते सवालों से | मुझे नफ़रत है, तेरे छूट जाने के ख्यालों से | मुझे फ़रत है, तेरी आधी-अधूरी मुलक़ातों से | मुझे नफ़रत है, तेरी सुलगती हुई बातों से | मुझे नफ़रत है, तेरे ये शक की आदतों से | मुझे नफ़रत है, तेरी ये अंधी इबादतों से … Continue reading मुझे नफ़रत है

चुरा लाया हूँ मैं

मेरे यादों के झरोखे से, एक पल चुरा लाया हूँ मैं | इसको रखूँगा संभालकर, जो कल चुरा लाया हूँ मैं | बड़े जतन से पेड़ पे चढ़कर, दो-चार आम तोड़ लिए है | खाते है मिलकर यार, चल, चुरा लाया हूँ मैं | आजकल काफ़ी वीराना है ? शायद माया जाल का ज़माना है … Continue reading चुरा लाया हूँ मैं

अभी इंसान हो

दुखी हो ? परेशान हो ? पशेमान हो ? डर लगता है ? सर फटता है? दम घुटता है ? प्रेम रोग है ? प्यारा भोग है ? कठिन योग है ? नींद नहीं आती ? याद नहीं जाती ? चिंता बोहोत सताती ? बिमारी है ? बुढ़ापा है ? मृत्यु है ? शत्रु है … Continue reading अभी इंसान हो

मुझे माफ़ करना माँ

तूने लाख समझाया पर मैं गांधीवादी बन गया | मुझे माफ़ करना माँ, मैं आतंकवादी बन गया | मुझे लोग कहते है दुश्मनी का दुश्मन, अधर्म ज़माने में, मैं धर्मवादी बन गया | मुझे माफ़ करना माँ, मैं आतंकवादी बन गया | नफरत है लोगों को मेरे पाक इरादों से, इस भ्रष्ट समाज में समाजवादी … Continue reading मुझे माफ़ करना माँ

मुझे होश नहीं

नौ दिल-ए-गिरफ्तार हूँ, मुझे होश नहीं | मैं तेरा प्यार हूँ, मुझे होश नहीं | कोई साज़ छेड़ मिलान का, ए मेरे फनकार, मैं इतना बेक़रार हूँ, मुझे होश नहीं | ना रोके मुझे कोई बंधन बन कर ज़ंजीर, मैं हवा-ए-फरार हूँ, मुझे होश नहीं | अश्क़-ए-मुस्तक़बिल करेगा, बीमार-ए-दिल का इलाज, मैं खुद नागवार हूँ, … Continue reading मुझे होश नहीं

मिलता नहीं रास्ता

कहाँ जाएगा मुसाफिर ? मिलता नहीं रास्ता | किस जानिब चलें ज़ीस्त ? मिलता नहीं रास्ता | कितनी झूठी कसम, और वादा कितना है सस्ता, कैसे सफर मुक्कमल हो ? मिलता नहीं रास्ता | नीचे ज़ुल्म-ए-ज़लज़ला, ऊपर खुदा हँसता, किसके पीछे चलें ? मिलता नहीं रास्ता | उसके हाथ में है तलवार जिसे दिया गुलदस्ता, … Continue reading मिलता नहीं रास्ता

मियां

पहले रब्ब का नाम लो, फ़िर करो क़बूल मियां | सबसे पहला आशिक़ वह, फिर वह नबी-रसूल मियां | झुका के सर उल्फत में, करूँ वो बंदगी | वक़्त सारा परस्तिश में, ऐसी गुज़रे ज़िंदगी मियां | फ़िक्र की माशूका है क़यामत, ज़िंदा को पहनाती कफ़न | लेहद तो फिर भी है शुक्र, होते सिर्फ … Continue reading मियां

मेरे जैसा ही था

पाप की गोद से जन्मा एक तारा, वह तारा जो मेरे जैसा ही था | वह भी था संसार से हारा,वह तारा मेरे जैसा ही था | भीख और उधार थी उसकी ज़िंदगी, उसका हिसाब मेरे जैसा ही था | दुनिया के एक हज़ार सवालों पर, उसका हर जवाब मेरे जैसा ही था | हरी … Continue reading मेरे जैसा ही था

मेरा भारत महान ?

चुल्लू भर पीने को पानी नहीं | पेट भर खाने को नहीं धान | क्या सच में है मेरा भारत महान ? चाँद पर यंत्र भेज दिया, सस्ते में बिकता है ईमान | क्या सच में है मेरा भारत महान ? दूध से है पत्थर नहाता, भूखा रहे रहीम, प्यासा रहे राम | क्या सच … Continue reading मेरा भारत महान ?

मर जाऊंगा

इतनी तारीफ़ ना करो, मर जाऊंगा | बस ! और प्यार नहीं, मर जाऊंगा | अभी और नहीं पी सकता, बस दोस्त ! अभी घर जाऊँगा | इतनी ज़ोर लगाने की ज़रुरत नहीं, कच्ची दीवार हूँ, छूते ही गिर जाऊँगा | समेट लो ना मुझे मुट्ठी में, शीशा हूँ ना, बिखर जाऊँगा | ऐसे ही … Continue reading मर जाऊंगा

मन तो चाहता ही रहा

मन तो चाहता ही रहा | मन तो चाहता ही रहा | सात सुरों के गीत गाता ही रहा | मन तो चाहता ही रहा | मन तो चाहता ही रहा | रक़्स की रात में, हर शख़्श की बात में, ना जाने क्यों, जाने क्यों ? रात भर याद आता ही रहा | मन … Continue reading मन तो चाहता ही रहा

मर रहा है

क्या हाल बताऊँ देश का ? देश में लगता है भगवान मर रहा है | वहाँ मेरा किसान मर रहा है, वहाँ मेरा जवान मर रहा है | कौनसे मज़हब की बात बताऊँ ? मज़हब तो भूखे गिद् खा गए | वहाँ मेरा हिंदू मर रहा है, वहाँ मेरा मुसल्मान मर रहा है हर एक … Continue reading मर रहा है

मैंने काला रंग चढ़ा रखा है

दुनिया ने खूब पंगा पड़ा रखा है, इसलिए मैंने काला रंग चढ़ा रखा है | बेकार ही ज़िंदगी को मुअम्मा बना रखा है, इसलिए मैंने काला रंग चढ़ा रखा है | दिल में इतनी नफरत का लोहा जड़ा रखा है, इसलिए मैंने काला रंग चढ़ा रखा है | सब ने सफ़ेद रंग में अपना रंग … Continue reading मैंने काला रंग चढ़ा रखा है

मैं तुम्हे नहीं बोलता

मैं तुम्हे नहीं बोलता, तुम मुझे क्यों बोलते हो ? छोडो मुझे, मेरी ज़िंदगी में क्यों ज़हर घोलते हो ? मैं तो तुम्हे नहीं कहता बदलने को ? तुम मुझे क्यों बदलने को बोलते हो ? मैं तुम्हे नहीं बोलता, तुम मुझे क्यों बोलते हो ? मेरे दिल की जानिब क्या ताकते रहते हो ? … Continue reading मैं तुम्हे नहीं बोलता

मैं रक़्क़ासा

मैं रक़्क़ासा मेरे यार की | मैं शौक़ीन मेरे प्यार की | मेरी आँखें गोया हज़ार माहताब, जन्नत अधूरी मिसाल मेरे निगार की | शराब ने सीखा मुझसे पीना, नशा बात करता मेरे ख़ुमार की | मुझसे है यह कायनात ज़ायेदा, दीवाने रह तकते मेरे इक़रार की | तेरा-मेरा मिलना तो तय था, देख दास्ताँ … Continue reading मैं रक़्क़ासा

मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ

मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ | मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ | मैं घायल, मैं बेलगाम हूँ | ऐसा भी नहीं के बेज़ुबान हूँ | मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ | ना मैं काबा, ना कब्रिस्तान हूँ | ना दरिया, ना रेगिस्तान हूँ | मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ | मैं ना हिंदू, ना मुसल्मान हूँ | … Continue reading मैं पशेमान हूँ, मैं इंसान हूँ

मैं नहीं जानता

जिसका कोई नहीं उसका कौन है, मैं नहीं जानता | मेरे नसीब का मालिक कौन है, मैं नहीं जानता | कौन अल्लाह ? कौन भगवान ? मुझे नहीं मालूम | ना पुराण, ना क़ुरान कौन है, मैं नहीं जानता | मुझे तो सिर्फ घर समझ आता है | क्या हिंदुस्तान ? क्या पाकिस्तान ? मैं … Continue reading मैं नहीं जानता

मैं खुनी हूँ, मैं खुनी

मैं खूनी हूँ, मैं खूनी | मैं खूनी हूँ, मैं खूनी | मैंने क़त्ल किया अरमानों का, मैंने क़त्ल किया फरमानों का, मैं खुद ही खुद का क़ातिल, मैं खूनी हूँ, मैं खूनी | मेरा चार नहीं दो-दूनी, मैं खूनी हूँ, मैं खूनी | मुझसे निग़ाहें नजर-बट्टू, मेरे दिमाग में पागल लट्टू, मैं शमशान का … Continue reading मैं खुनी हूँ, मैं खुनी

मैं इंसान हूँ

मैं इंसान हूँ, मेरा मज़हब कोई नहीं है | मैं इंसान हूँ, इसमें गज़ब कोई नहीं है | मैं ही मैं हूँ, चारों जानिब, मैं ही ख़ुदा हूँ, मेरा रब्ब कोई नहीं है | मैंने बनाया और फिर मैंने मिटाया | मैंने काटा और मैंने ही कटाया | मैं ही क़त्ल हूँ, क़ातिल भी मैं, … Continue reading मैं इंसान हूँ

मैं ही गुन्हेगार नहीं

तुम भी शामिल हो, मैं ही गुन्हेगार नहीं | तुम क्यों मेहमिल हो ? मैं ही गुन्हेगार नहीं | एक वार तुमने किया, एक वार किया मैंने, तुम भी घायल हो, मैं ही फ़िगार नहीं | मिले क्यों मुझे ही कफ़न का इनाम खुदा से ? तुम भी बिस्मिल हो, मैं ही निगार नहीं | … Continue reading मैं ही गुन्हेगार नहीं

मैं आइना हूँ

मैं आइना हूँ, मैं सच बोलता हूँ आपकी छवि बताता हूँ, सच और झूठ तोलता हूँ, मैं आइना हूँ, मैं सच बोलता हूँ | भला करो, भला होगा, बुरा करो, बुरा होगा, मैं लोगों को ये बात याद दिलाता हूँ | मैं आइना हूँ, मैं सच बोलता हूँ | मैं जोड़ता हूँ इंसान को इंसान … Continue reading मैं आइना हूँ

यूँही

खत्म कर दो सब प्यार के किस्से तुम, यूँही | जी लेने दो मुझे ख्वाब-ए-गफलत में, यूँही | तुम आज आयी हो जब मेरे हाथ खाली है ? ले जाओ और कुछ नहीं तो मेरी जान तुम, यूँही | इन सपनों से कोई पूछे की नींद से दोस्ती क्यों है ? इस मायूसी से कोई … Continue reading यूँही

यह उस वक़्त की बात है

यह उस वक़्त की बात है, जब ज़िंदगी अंजान थी | यह उस वक़्त की बात है, जब ज़िंदगी बेजान थी | दुनिया का पहला निवाला चखा था हाथों से, वक़्त की बात है, जब ज़िंदगी हैरान थी | हम दोनों ने एक ही थाली से खाया था निवाला, यह उस वक़्त की बात है, … Continue reading यह उस वक़्त की बात है

मैं आदमी

आज़ाद देश का ग़ुलाम बंदा हूँ | मैं इंसान नहीं, एक धंधा हूँ | चुप रहो तो कहते है मुझे खुदगर्ज़, लड़ता हुँ तो कहते है के खून गंदा है | कहाँ है जलाना मेरे बस में ? मैं सूरज नहीं, चंदा हूँ | मुझे में नहीं है झूठ बोलने का ढंग, मैं आदमी ही … Continue reading मैं आदमी

समझ नहीं आता

वह मुझे समझ नहीं पाते, मैं उन्हें समझ नहीं पाता |यह कैसा रिश्ता है अजब ? मुझे समझ नहीं आता | ख़ुदामंडी में बहुत से खुदा बिक रहे है, कौनसा ख़ुदा खरीदूं ? मुझे समझ नहीं आता | मुद्दत से उनके दिल से बात करने की कोशिश की, किस अदा से बयां करूँ ? मुझे … Continue reading समझ नहीं आता

नेता

परसों तुझे टीवी पर देखा, अरे ! तू तो कमाल बन गया | तू तो बादशाह था, साला अभी हमाल बन गया | सारे देश को बेचने का बोझ तूने ही उठा लिया | सारे बचत का पैसा तूने अकेले ही लूटा दिया | गज़ब है ! तेरे हाथ में पेन होता तो टैगोर बन … Continue reading नेता

मुझे वह सब याद है

मुझे वह सब है याद जो कभी हुआ ही नहीं |वह एक आशियाँ आबाद जो कभी हुआ ही नहीं | मुझे वह सब याद है तेरे-मेरे तालुकात, और वह एक इत्तिहाद जो कभी हुआ ही नहीं | मुझे वह सब याद है तेरी हिचकिचाहट, और वह संग, फुवाद जो कभी हुआ ही नहीं | मुझे … Continue reading मुझे वह सब याद है

मैखाने में

एक शमा जलाये रखना मैखाने में | मैं आऊंगा रात मैखाने में | उनकी याद है दिल में, उनकी साँसों में मेरी साँस है | उनकी आदत है बेइन्तहां मुझे, उनकी तस्वीर लगाये रखना मैखाने में | प्यार के गीत मैं गुनगुनाता हूँ सदा, मौत ने मेरी बनाया है मुझे रिंद-ए-मैक़दा | उनकी बदन की … Continue reading मैखाने में

मेरे गाँव की बात

दिन हो, या हो चांदिनी रात, बजते ताशे जैसे दूल्हे की बारात | ऐसा प्यारा गाँव है मेरा और मेरे गाँव की बात | दिन में सूरज की पूजा होती, रात में होता काम दूजा | सभी मिलकर रहते है, ज्ञानी, पंडित हो या खोजा | लस्सी और शराब की नदियाँ बहती है, ऐसी है … Continue reading मेरे गाँव की बात

मेरा परिचय

मैं हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हूँ | मैं पंडित, मौलवी, मैं कसाई हूँ | मुझसे ना पूछो ज़ात मेरी, मैं वह फटे कपडे की सिलाई हूँ | अलग-अलग है मेरे रूप जगत में, कभी मैं किसान, कभी सिपाही हूँ | मैं दिवाली हूँ, मैं ईद हूँ | कभी मैं बहन, कभी भाई हूँ | किसी … Continue reading मेरा परिचय

लेकिन

कुछ मैं भी करता हलाल लेकिन | जीवन में रहा सिर्फ मलाल लेकिन | करता मैं भी दुनिया मैं मसीहाई, अजब ही रहा मैं फिलहाल लेकिन | बन जाते मेरे भी हाथ देने वाले, ख़ुदा ने रखा मुझे बेहाल लेकिन | दिखाना चाहता था चांदिनी रात उसको, उस रात रंग चाँद का था लाल लेकिन … Continue reading लेकिन

लाशें

हर तरफ पड़ी है लाशें | बेबस, बेशक खड़ी है लाशें | नंगी आँखें समुंदर गोया, आधी जली फुलझड़ी है लाशें | अपनी की क़बर कन्धों में लादे, बेख़ौफ़ मौत से बड़ी है लाशें | क़ुरबानी के नाज़-मीनार के तले, ज़िंदा मिसाल गड़ी है लाशें | सफ़ेद उड़ान कैदी वक़्त की, पैरों में हथकड़ी है … Continue reading लाशें

क्यों कहते हो मुझसे ?

क्यों कहते हो मुझसे के यार ना करो ? क्यों कहते हो मुझसे के प्यार ना करो ? खुद तो मांगते हो ख़ुदा से हज़ार आँखें, मुझसे कहते हो के आँखें चार ना करो | शौक़ है तुमको क़त्ल-ए-सर-ए-आम का, मुझसे कहते हो जान निसार ना करो | खुद तो मोज़ेचा बने फिरते हो जहान … Continue reading क्यों कहते हो मुझसे ?

शराफ़त छोड़ दी मैंने

कितनी बार कहूँ ? शराफ़त छोड़ दी मैंने | अब शराब नहीं पीता, उनके जैसे नहीं जीता | शराब तो शरीफ़ लोग पीते है | शराब पिके झूमते है | औरों की बातें करते है | गंदी-गंदी बातें | झूठ बोलते है | कभी शेर, कभी बंदर, कभी सुअर बन जाते है | अब शराब … Continue reading शराफ़त छोड़ दी मैंने