मन का समुंदर

मन के समुंदर की गहराइयां बोलती है ।
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयां बोलती है ।
हर जुर्म की सज़ा मिलती है यहां,
कोई नहीं बचता जब गवाहियां बोलती है ।
जिंदगी की धूप भी अजब है ।
अंधेरों में परछाइयां बोलती है ।
जब दर्द हद्द से गुज़र जाता है,
चीख-चीख के रुसवाइयां बोलती है ।

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