प्रारंभ ही हुआ युद्ध से

प्रारंभ ही हुआ युद्ध से,अब हसकर लड़ ख़ुद से ।ले यलगार का हाला हाथ, अलग कर मिश्रित को शुद्ध से ।अंत कोई अंतिम नियति नहीं, अब क्या डरना प्रारब्ध से ?

वक़्त गुज़रता है

वक़्त गुज़रता है, पैर भी फिसलता है ।ज़िंदगी में यार, सब कुछ कहाँ मिलता है ।और आगर सब कुछ मिल भी जाए तो,किसने दिया, कितना दिया, कहाँ पता चलता है ।

प्रेम की परिकाष्ठा

प्रेम की परिकाष्ठा अहंकार का अंत होता है ।जहाँ प्रेम हो, वहीं ईश्वर का आवास होता है।अंततः, जो प्रेमी हो वही संत होता है ।

वक़्त गुज़रता है

वक़्त गुज़रता है, पैर भी फिसलता है ।ज़िंदगी में यार, सब कुछ कहाँ मिलता है ।और आगर सब कुछ मिल भी जाए तो,किसने दिया, कितना दिया, कहाँ पता चलता है ।

दादर स्टेशन

जब धड़कने रुक जाए,होश उड जाए,पसीने छुट जाए,शरीर कांप जाए,खून सूख जाए,चैन खो जाए,इज्ज़त का कचरा हो जाए,आँख से समुंदर आ जाए,रग-रग में करंट दौड़ जाये,खून खौल जाए,भूखे भेडिये नज़र आएं,क़त्ल करने का मन बन जाए,कोई उम्मीद नज़र ना आये,इंसानियत से भरोसा उठ जाए,तब समझ जाना,दादर स्टेशन आ गया |

पहले शेर पढ़ता हूं

पहले शेर पढ़ता हूं, मेरा फ़न देख लो ।इसी बहाने फ़नकार का मन देख लो ।अच्छी ना लगे तो मार देना मेरे हर्फ़ों को,कमसेकम फ़नकार की लगन देख लो ।

उसकी याद में

उसकी याद में,इश्क़ की फ़िराक में,उसकी बात पर,उसकी हर बात पर,अपने हालत पर,दर्द-ए-हाल पर,जिस्म-ए-कंगाल पर,मैं उसे पकड़ कर खुब रोया ।

बिस्तर के पैंतरे

बिस्तर के पैंतरे तो आते नहीं ।सियासत के पैंतरे क्या ख़ाख करोगे ।बर्फ़ के जैसा है ठंडा जोश तुम्हारा,आग लगाने के पैंतरे क्या ख़ाक करोगे ।

बाप रे बाप !

तू से तुम, तुम से आप ।क्या कर रहे हो बाप ?शब्द तुम्हारे डसते है मुझे,तुम इंसान हो या साँप ?कुत्ते को घी हजम नहीं होता ।इतनी इज़्ज़त !बाप रे बाप !

तिरंगा

सब जगह बिक रहा है तिरंगा ।इस बार महेंगा बिक रहा है तिरंगा ।छोटी-छोटी लकोरें, छोटे-छोटे हाथों में,छोटे-छोटे हाथों में बिक रहा है तिरंगा ।

पता नहीं !

नदी कहां से निकलती है और कहना जाती है ?पता नहीं ! कहीं से तो निकलती है और कहीं तो जाती है ।प्रेम कहां से निकलता है और कहां जाता है ?पता नहीं ! कहीं से तो निकलता है और कहीं तो जाता है ।