बोहोत दिनों बाद

बोहोत दिनों बाद दिखा एक चेहरा पहचाना सा |
इस शहर का कोई है राज़ गहरा पहचाना सा |

कुछ जानी-मानी सी ये कैसी प्यास है ?
कुछ जाना-माना सा है ये सेहरा पहचाना सा |

कितने रंगों की तस्वीर बन गयी है ये सुबह-सुबह,
गुज़री रात की ख़ामोशी और अँधेरा पहचाना सा |

निज़ाम है इस शहर का कुछ अपने जैसा अजब,
लगता है इस मुहाफ़िज़ का पहरा पहचाना सा |

Leave a Reply