आखिर ख़ुदा हार गया

पल-पल ही साथ रहा बनके कोई हिस्सा,
कभी मैं इतिहास बना, कभी कोई किस्सा |

मुझसे रूठ कर मेरा यार गया,
कम्भक्त, आखिर ख़ुदा हार गया |

बंद पन्नो मैं सांस लूँ कब तक ?
कब आज़ाद कोई कलम को दूँ दस्तक ?

मेरे गहरे सपनो में रहने वाले,
पत्थर क्यों ख़रीदे कोई गहने वाले ?
एहबाब में फिर कोई मुझे मार गया,
कम्भक्त, आखिर ख़ुदा हार गया |

मौला ! कब्र पे रख दी है जो किताब,
इस बार चुकाऊंगा बाकी वो हिसाब |

किसकी की पतंग किसी के घर जा गिरी,
किसी की ज़ीनत किसी के दर जा गिरी,
इस बार नाखुदा नदी पार गया,
कम्भक्त, आखिर ख़ुदा हार गया |

खुदा को भी नहीं मिला होगा कोई अपने जैसा,
खुदा को भी लगा होगा काफ़िर सपने जैसा |

मैं ज़िंदा था, कोई दूसरा यमराज मार गया,
कम्भक्त, आखिर ख़ुदा हार गया |

Leave a Reply