प्रेम की परिकाष्ठा

प्रेम की परिकाष्ठा अहंकार का अंत होता है ।
जहाँ प्रेम हो, वहीं ईश्वर का आवास होता है।
अंततः, जो प्रेमी हो वही संत होता है ।

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