कल फिर वह काली रात थी

कल फिर वह काली रात थी,
जिसने मुझे मेरी औकात दिखा दी ।
कल फिर वह काली रात थी,
जिसने मुझे मेरी ज़ात दिखा दी ।
कल फिर वह काली रात थी,
जिसने मुझसे मेरी मुलाक़ात दिखा दी ।
कल फिर वह काली रात थी,
जिसने मुझे वही बात याद दिला दी ।
यह काली रात बार-बार क्यों आती है ?
क्या कुछ ज़ख़्म वक़्त से नहीं भरते,
क्या कुछ रिश्ते ख़ामोशी से नहीं मरते ?
क्या कुछ यादें दफ़्न होकर भी,
हर रात साँस लेने लगती हैं ?
शायद इसी लिए यह काली रात,
बार-बार आती है,
क्योंकि उजाले में,
मैं ख़ुद को देखना भूल जाता हूँ,
और अँधेरे में,
मैं ख़ुद से मिलना सीख जाता हूँ ।
कल फिर वह काली रात थी ।

Leave a Reply