ज़िंदगी का जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
दर्द-ओ-ग़म का जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
रोने से कुछ नहीं हुआ हासिल,
रोने का जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
एक अर्जे से दिल वीरान था |
तन्हाई का जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
इश्क़-नफरत,
इल्म-गफ़लत,
कैफ़ियात-इबादत,
दोनों में उलझन थी |
दोनों का जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
ऐब तो मुझमें था |
मेरा एक ही दिल था |
मेरी सिर्फ़ दो ही आँखें थी |
खुद अपना ही जब मज़ाक बनाया,
ज़यादा मज़ा आया |
