Y-सिंड्रोम

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मोहित का दिमाग भी उसकी वासना जैसा ही गरम और अस्थिर था | ये डूड तो कभी एक जगह पर टिकता ही नहीं था | कभी इस डाल तो कभी उस डाल, कभी इधर डाल तो कभी उधर डाल |

क्या ?

अपनी नाक |

आप क्या समझ बैठे ?

लेकिन दिमाग में – इस उम्र में – गंद और मस्ती होना नेचुरल है | वैसे ही जैसे मोहित की ये गंदी और मस्ती भरी कहानी |

देर रात हो गयी थी | काफ़ी सेहत भरे जामों के बाद मोहित अपने नए-नवेले हिल रोड वाले किराये के मकान में बैठा पुरानी यादों में खो गया | मोना, शैली, सिम्मी, जेनी, कृति, माया, ज़ेनोबिया, मुस्कान, राधा, उर्वशी और कामवाली बाई चंपा को गिन के नजाने कितनी और एक्स की याद उसको मुक्के मार रही थी |

बेचारे ने सबके मुक्के-लाते ही खायीं थी |

पर बिस्तर पे प्रेम-सुधा बरसने के बाद |

किसी भी लड़की के साथ टिक ही नहीं पा रहा था और एक ने तो कस के थप्पड़ के साथ दिमाग के डॉक्टर के पास जाने की फ़ोकट की सलाह भी दे दी थी | दिमाग काफ़ी परेशान था तो उसने सोचा की अपनी साइकोलोजिस्ट फ्रेंड से बात कर ही ली जाए | सीन संगीन था और रात रंगीन थी | ऊपर से साइकोलोजिस्ट फ्रेंड ने कभी भी कॉल करने की अनुमति दे राखी थी |

मति मारी गयी थी उसकी, शायद |

अब और ये दर्द सहेन नहीं हो रहा था तो मोहित ने ताव में आके फ़ोन लगा ही दिया अपनी साइकोलोजिस्ट फ्रेंड को |

हेल्लो डॉक्टर | हाऊ आर यू जानु ?

हैप्पी एंड गे !

हैं ? ये क्या होता है डॉक्टर ?

कुछ नहीं यार, बस बॉयफ्रेंड की आदत लग गयी है |

मस्त डाइलोग है यार डॉक्टर |

हाँ, ये उसका कॉपीराइट है |

अच्छा, मैं तो कुछ और ही समझा |

तुम्हारे दिमाग में तो हमेशा गंद ही रहता है मोहित | अच्छा बताओ फ़ोन कैसे किया ?

कैसी चल रही है तेरी झींगा-झांगी ?

ये तू अपने घटिया जोक्स कब बंद करेगा ?

ही ही, जल्द ही | पर ये बॉयफ्रेंड का क्या चक्कर है ? पहले वाला गया क्या ?

हाँ यार, ये नया है और टिकाऊ भी |

ये साले लोंडे कोई टिकाऊ-विकाऊ नहीं होते | सब धत्तिंग है |

नहीं यार, ये एकदम अलग ही है | तू बता, कैसे फ़ोन किया ?

यार, क्या बताऊ? पुरानी यादें सोने नहीं दे रही |

अच्छा. मतलब कोई पुरानी गर्लफ्रेंड साथ है क्या ? बोलो-बोलो ?

नहीं यार, कोई टिकती ही नहीं, यही तो प्रॉब्लम है |

टिकेगी कैसे मोहित ? तुम्हे तो खुद ही जल्दी भगानी होती है | तुम चाहते कहाँ हो एक जगह टिकना  या एक को टिकाना ?

नहीं-नहीं डॉक्टर, एसा नहीं है |

घंटा |

क्या यार तू भी !

मोहित, तुम सब कुछ इतना जल्दी कर लेते हो की आगे कुछ करने या जानने के लिए रहता ही नहीं है | तुम प्रेम-रिश्ते का सारा जूस इतना जल्दी पी लेते हो की फिर तुम बोर हो जाते हो |

पर डॉक्टर, प्रेम-रिश्ते में इसके अलावा कुछ और भी होता है क्या ?

शिट, घटिया बंदे हो तुम यार मोहित |

मुझे प्लीज़ समझाओ डॉक्टर | ये क्या हो रहा है मेरे साथ ?

बस, यही तेरा प्रॉब्लम है | सब लड़कयाँ थोड़ी ही दिनों में समझ जाती है के तुझे सिर्फ उनको साथ सेक्स ही करना है | पर यार, ये सिर्फ तेरी प्र्ब्लेम नहीं है | इसे Y-सिंड्रोम कहते है |

हैं ? ये क्या होता है डॉक्टर ?

तो मर्दों में Y-क्रोमोसोमस होते है | ये उनका एक चरित्र है |

अब बातों में गर्माइश आने लगी | मोहित चुप हो गया |

सेक्शन गरम होने लगा तो वो कल्पनाओं की दुनिया में खो गया | डॉक्टर और अपने प्रेम-सीन को सजाने ही लगा था के डॉक्टर ने बीच में फांदा मार दिया |

हेल्लो ! मोहित कहाँ खो गए

सॉरी, कहीं नहीं बस तेरी बात ही सुन रहा हूँ जानू |

हाँ, तो मैं ये बोल रही थी के Y-क्रोमोसोमस का एक चरित्र है | इसलिए तुम में उत्तेजना और जिज्ञासा ज्यादा है |

बाप रे ! सीडकटर, सॉरी, सो डॉक्टर, अब मैं क्या करूं ?

जैसे मैंने पहले भी कहा था, कुछ नया करो |

जैसे की ?

अगली बार अपने प्रेम-रिश्ते में जल्द-बाज़ी मत करो | मुझे ही ले लो…

चलेगा !

बकवास बंद करो | मेरा मतलब ये है के मेरा और मेरे बॉयफ्रेंड का किस्सा ही ले लो | हम इतने पास है पर फिर भी लगता है के कितना कुछ जान ने को बाकी है | मेरा बॉयफ्रेंड एकदम परफेक्ट नमूना है एक अच्छे मर्द का |

तो तेरा मतलब है के उसमें ये Y-सिंड्रोम नहीं है ?

नहीं ! वो तेरा जैसा वासना का पुजारी नहीं है | वो एक सीधा-साधा टाइप्स नमूना है |

वाह रे वाह ! लकी है यार तू डॉक्टर | पर मैंने भी अब एक नया प्रेम-रिश्ता बना ही लिया है |

वाह ! कौन है वो ?

अभी नहीं | थोड़े दिनों में सब पता चल जाएगा | बुरा नहीं मानना, पर मैं इन लड़कियों से तंग आ चूका था | इनके नखरे मुझसे सेहन नहीं होते | अब ये नए प्रेम-रिश्ते में ये सब झंझट ही नहीं है |

मोहित, क्या मतलब ? मैं समझी नहीं |

यार, मैंने बोहोत सोचा तो पता चला के मेरी रुचि लडकियों में अब नहीं रही | मैं कुछ नया ही करना चाहता हूँ |

मोहित, चक्कर क्या है ?

बोल रहा हूँ ना यार |

कौन मोहित ?

एक लड़का है |

क्या ?

येस ! आज ही मिला है | समझो लव एट फर्स्ट साईट है | वैसे भी वैरायटी इस द स्पाइस ऑफ़ लाइफ |

गुड बॉय |

कुछ गलत किया क्या डॉक्टर ?

नहीं | ये बिलकुल नॉरर्मल है पर ये प्रेम-रिश्ता बनाये रखना |

बिलकूल | तेरी बात अब मान ली है और ध्यान से काम करूँगा | तेरा और तेरे बॉयफ्रेंड के रास्ते पे चलूँगा |

गुड बॉय | चल अब मैं भी सोती हूँ | तेरा क्या सीन है ?

थैंक्स यार डॉक्टर | बस, वो आता हो होगा | फिर लूट ही लूट |

चलो ठीक है मोहित |

गुड-नाईट एंड वेट ड्रीम्स |

कुछ भी बकवास बोलता है यार तू मोहित | रखती हूँ |

गुड-नाईट |

बात करके मोहित का दिल गार्डन-गार्डन हो गया | मस्त एक लम्बा सेहत भरा का जाम लगया और अपने नए यार के आने की तय्यारी में लग गया |

थोड़ी देर में यार आ गया और दोनों ने खूब जमके पार्टी की |

रात काफ़ी रंगीन गुजरी होगी | उठते ही एक दुसरे को प्यार भरी आँखों से देखने लगे | मोहित खुश था | ना लड़कियों वाले नाटक ना वो रूठना-मनाना | यहाँ तो सब सीधा और साफ़ था | बड़े ही प्यार से अपने नए प्रेमी से बात की |

जानू ! गुड मॉर्निंग |

हाँ यार, गुड मॉर्निंग, मोहित |

हाऊ आर यू जानु ?

हैप्पी एंड गे !

एक पल के लिए जैसे मोहित बेजान पुतला बन गया और फिर अगले ही पल मुस्कुराता हुआ अपने वैरायटी वाले स्पाइस उर्फ़ नए प्रेमी की बाहों में डूब गया |

 

वो कौन थे ?

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मेरठ से आई रेलगाडी पांच घंटे लेट थी | दिमाग और मौसम वैसे ही ख़राब था उस पर कोयल की फूटी किस्मत – मुंबई बंद |

यहाँ नयी जॉब से दिल में ठंडक आई थी और पता नहीं क्या हुआ, पुरा शहर जल रहा था | जैसे शमशान में मुर्दे जलते है ना, एकदम वैसे | ना जाने किसने माचिस जलाई थी | ना जाने किसने ये आग फैलाई थी |

कोयल पहली बार इस खूंखार शहर – जिसे लोग सपनो का शहर कहते है – आई थी | एकदम बौखलायी सी थी, सारा माहोल देख कर |

रेलवे स्टेशन से बाहर का सीन एकदम बिल्ला था |

घोर रात थी और बिना सर के धडों की एक भीड़ बाहर खड़ी थी | उस पूरी भीड़ का कुल आई. क्यू. रूम टेम्परेचर से भी कम रहा होगा | भीड़ का एक समंदर रेलवे स्टेशन के अंदर था और एक सैलाब बाहर लीच की तरह लोगों के बाहर आने की मानो प्रतीक्षा कर रहा हो | ये वो निकले, और ये वो उनका खून चूस लें |

सेक्शन गरम था |

लोग बेकाबू हुआ पड़े थे | चारों और आग ही आग थी, दंगा ही दंगा था, शोर ही शोर था | क्या हुआ था किसीको नहीं पता पर हर कोई ओनी एक्सपर्ट राय मुफ्त में बाँट रहा था |

प्यारी कोयल बोहोत डरी हुई थी पर पिताजी फौजी थे और उन्होंने कभी ना डरने की ट्रेनिंग बचपन से दी थी अपनी लाडली को | तो वो सारी ट्रेनिंग और ज्ञान समेत कर, लोगों से धक्का-मुक्की करके बाहर जाने की कोशिश करती रही |

पर भीड़ से तो ख़ुद नारायण भी कतराते है, क्या फौजी का ज्ञान, क्या आम आदमी ?

ए लड़की, दीखता नहीं क्या बे तुझे ?

सॉरी अंकल, गलती से धक्का लग गया |

पर मुझे मज़ा आया |

क्या कहा आपने ?

जा बे, अपना काम कर |

कोयल बुरा नहीं मानी | अश्लील बातों की उसे आदत थी | अपना इलाका होता तो फिर भी एक चपेड मार कर मामला निपट सकता था पर ये शहर बिलकुल नया था | वो फिलहाल चुप ही रही |

भीड़ अब बेचैन और बेकाबू हो चली थी | धक्का-मुक्की बढ़ने लगी | लोग औरतों, बच्चों और बूढों का ख्याल भूल गए | इस झल्लाए हुई भीड़ में ना जाने कितने गंदे शरीर कोयल को छू गए, ना जाने कितनी गंदी आँखें उसके कपडे के पार चली गयी और ना जाने कितने हाथ इधर-उधर उसके तन पे फिसल गए |

रात अभी काली थी |

शायद, इस रात की कोई सुबह है भी नहीं |

उतने में पुलिस की एक टुकड़ी रेलवे स्टेशन पे पास आयी और बताया की शहर में तनावपूर्ण शांति है | इसका मतलब तो कोयल की समझ में नहीं आया पर ये ज़रूर आया की सपनों का ये शहर आज सोयेगा नहीं, रात भर जागेगा और जगायेगा |

बेचारी भोली थी, कर्फ्यू के जानवर से बिलकुल अनजान |

रेलवे स्टेशन पर कहीं सिसकती आँखे थी, कहीं उदास चेहरे तो कहीं हंगामा | कहीं घडी में बार-बार टाइम देखते लोग थे तो कहीं सुखे-भूखे कुत्ते | पुलिस बार-बार सबको अंदर ही रहने की सलाह दे रही थी |

बाहर बिना सर के धडों की भीड़ ने काफी गाड़ियाँ जला के राख कर दी थी और अपने हाथ में बोतल और पत्थर लिए अगला शिकार की तलाश में थे – शांति से |

एकदम शांति से |

अचानक कहीं से आवाज़ आई और बात करने लगी | जैसे भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती, शायद, उसकी कोई एक प्रकार की आवाज़ भी नहीं होती | ना कोई शक्ल दिखी ना कोई आहट हुई | मानो जैसे खुद शहर ही बात कर रहा हो | काल्पनिक है पर हुआ ठीक ऐसा ही |

उस बेशक्ल की आवाज़ ने सबको चौका दिया |

आज बंद है | आज मेरा शहर बंद रहेगा पर चकला चालु रहेगा | कचरा फेकना चालु रहेगा, बलात्कार और छेद-छड चालु रहेगी, धोखा-दड़ी तो कभी बंद होती ही नहीं, गाली-गलोच, तू-तू-मैं-मैं भी चालु रहेगी, कुत्ते भोकेंगे, फूल खिलेंगे और आज फिर रिक्शा वाले कहीं भी जाने के लिए ना ही कहेंगे | यारों, चिंता ना करो | मुंबई हमेशा चलता रहता है, कार्यशील रहता है, रास्ते में रहता है | शहर बंद है तो क्या हुआ, दिल तो चालु है ना ? आग तो बंद नहीं होती – दिल में हो या सडकों पे | कुछ नहीं होगा, चिंता ना करो | शहर में तनावपूर्ण शांति है |

कोयल सोच में पड़ गयी | इस सपनों के शेहर में आते ही एक सपना जैसा ही कुछ दिखयी दिया | ना वापिस जाने का कोई रास्ता था ना आगे जाने का | लोग लोगों को मार रहे थे, तोड़-फोड़ कर रहे थे | अपने ही शहर को बर्बाद करके अपनी किसी सफलता पर जश्न भी मना रहे थे | बस रेलवे स्टेशन के अंदर आना बाकी था जो पुलिस की मेहेरबानी से नहीं हुआ |

नयी जॉब का कल पहला दिन था और रात तो सारी रेलवे स्टेशन ने ही रख ली | मुंबई बंद करने वालों के शानदार तोहफा दिया था | बेचारी यही सोचती रही के आगे का जीवन इस शहर में कैसे निकलेगा |

लोगों ने तो अपना कुछ अलग ही परिचय दे दिया था |

क्या यहाँ लोग ऐसे ही है ? क्या ऐसे ही लोगों से रोज़ पाला पड़ेगा ? क्या यहीं मुंबई है ? इतनी नफरत लोगों के दिलों में आयी कैसे होगी ? कहाँ से आये होंगे ये लोग ? क्या यहीं मुंबई है ?

सोचते-सोचते भोर होने वाली थी | ना जाने कहाँ से आए वो बिना सर के धडों की भीड़ ना जाने कहाँ को चली गयी |

शहर अध-जला सा हो चुका था | बाहर पत्थर, शराब की खाली बोतलें, जलते टायर, चिप्स के खाली पैकेट और खून की छीटें बिखरी थी |

बड़ी हिम्मत करके कोयल सबसे लास्ट में बाहर निकली | बाहर कुछ ऑटो-रिक्शा वाले खड़े थे | शहर जाग रहा था, डर भाग रहा था | उसके जान में जान आयी |

भईया, गोरेगांव चलोगे ?

नहीं |

 

शेम कथा

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शमन जवानी की चोटी पे था | खून में जवानी, बातों में जवानी, दिल में जवानी, जेब में जवानी, जवानी ही जवानी | जवानी तो जैसे रम थी जिसे वो रोज़ ही पीता और जीता था |

उम्र २५ की थी पर घमंड एक युग पुराना और स्टाइल फुल फिल्मी |

हर पल कुछ नये की तलाश में रहता था | एक दिन इस नये के चक्कर में अपना पुराना नाम को चेंज करके ये नया नाम – शमन – रख दिया | पर झोल इस नये की तलाश में नहीं पर कभी एक जगह पर न टिकना में था |

कभी पे पेंदे के लोटे जैसे उधर, तो कभी इधर | बाप किसान, बेचारा फावड़े से कमाता था और शमन *** से गवाता था|

समझ गये ना !?

रात शुरू ही हुई थी के शमन के दिमाग जैसे खाली घर में घंटी बजी | दरवाज़े पर उसकी गर्लफ्रेंड – रिया – साक्षात काली माँ का रूप धारे खड़ी थी | बड़े ही पप्पियों-झाप्पियों से रिया का स्वागत हुआ और वो तेज़ी से अंदर आकर सोफे पे बैठ गयी |

रूम में एकदम अँधेरा था | सिर्फ कैंडल-लाइट डिनर जैसा मूड बना हुआ था |

बको, क्यूँ बुलाया है मुझे ?

रिया, मेरी जानू…

मैं अब तुम्हरी जानू-फानू नहीं हूँ |

हाँ सॉरी | रिया, मैंने तुम्हे बोहोत सताया है |

तो, इसमें नया क्या है शमन ?

मेरी बात तो सुनो ना |

बको |

मैं अपनी गलती मानता हूँ | मैंने तुम्हारे साथ कभी वफ़ा नहीं निभाई |

ये तो मैं अच्छी तरह समझ चुकी थी इसलिए तुम्हे लात मारके अपनी जिंदगी से निकल दिया |

ठीक किया रिया पर मैं पश्चाताप की आग में सुलग रहा हूँ और प्रायश्चित करना चाहता हूँ |

क्या ? पचा…पश्चा…प्रायचित…क्या बकवास बोल रहे हो तुम ? साफ़-साफ़ बात करो |

सॉरी-सॉरी | मैं अपनी गलती सुधरना चाहता हूँ |

शमन, तुम कुत्ते हो और अपना कोई उल्लू सीधा करने के चक्कर में होगे |

नहीं-नहीं रिया, सच में | मेरी बात सुन तो लो प्लीज़ |

ओके, बको |

इतना बोलते ही शमन ने सोफे के नीचे से एक रम का क्वार्टर निकाल लिया | दो घूँट भी लगा लिए – बड़े वाले | रिया भी कम ना थी | उसने भी रम एक घूँट लगा लिया और अकड के बैठ गयी |

शमन, तुम कुत्ते हो सही में, आगे बको |

एक्चुअली रिया, मैंने तुमसे प्यार का नाटक किया था | तुम्हारा हरा-भरा शरीर देखकर मुझे वासना की आग जाग गयी और मैंने तुम्हे पटाने का सोचा | पर जैसे-जैसे हम पास आने लगे…

हाँ, जैसे-जैसे तुम्हारा नीच शरीर मेरे पास आने लगा, एसा कहो |

अच्छा ठीक है, वैसा ही पर अब मैं अपनी गलतियों को सुधारना चाहता हूँ | मैं तुमसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ, बदलना चाहता हूँ |

हो गया ?

हाँ |

तो सुनो | मैं ये तो समझ ही गयी थी, भले देर लगी | तुम्हारी हरकतों से ये साफ़ पता चलता था के तुम सिर्फ मुझे यूज़ करना चाहते थे और इसलिए कभी बाहर मिलते ही नहीं थे | हमेशा मुझे घर पे ही बुलाते थे | तुम क्या मुझे इतना बेवक़ूफ़ समझते हो, शमन ?

सॉरी |

शेम-शेम | शर्म आनी चाहिए तुम्हे |

आ रही है, बोहोत | पर अब मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ, रिया |

बकवास बंद करो, मुझे जाना है | तुम्हारी लाइफ तुमरे इस अँधेरे रूम जैसे ही है, लूसेर |

इतना कहती ही ज़ोर का धक्का देकर रिया दरवाज़े की तरफ जाने लगी | शमन पैरों पर गिरके माफियाँ मांगने लगा पर वो ना रुकी | क्या रूकती ? आखों में खून था और पेट के अंदर रम |

गेट लॉस्ट कुत्ते |

ऐसा बोलकर रिया ने एक कसके थप्पड़ धर दिया शमन के गाल पर |

उसके जाते ही रूम में पहले जैसा सन्नाटा हो गया | शमन अभी ज़मीन पे ही पड़ा था | रोने जैसे चेहरा हो गया था | शायद शर्मिंदा था, शायद डरा हुआ या शायद फिर कुछ नये की तलाश में | धीरे से सोफे के ऊपर बैठा, बाल बनाये, थोडा सा मुस्कुराया, एक और बड़ा घूँट रम का पिया और अपनी लेफ्ट हाथ की बीच वाली ऊँगली दरवजे तो दिखाते हुए बोला पड़ा |

पकाऊ साली |

 

जूनियर कॉलेज

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दसवी की परीक्षा में सावन को ७८% मिल गए थे | ठीक-ठाक ही थे उस ज़माने में जब हिंदी फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे ने सारे देश में धूम मचा राखी थी |

सावन को एक अच्छे कॉलेज में दाखला लेना था तो मुंबई के सुंदर जय-हिंद कॉलेज में जैसे-तैसे आखरी लिस्ट में आखरी नाम आ ही गया |

कॉलेज अति सुंदर था | हिंदमहासागर के किनारे था | क्या हवा, क्या नज़ारा, क्या लड़कियां – वल्लाह, एकदम परी जैसी लड़कियां और परियों को उसने मिनी-स्कर्ट में पहली बार देखा था | लौंडे तो हवा सी तेज़ गाड़ियों में जोर-जोर से इंग्लिश गाने बजाते हुए दीखते थे | सारा दिन बस यहीं चहेल-पहेल रहती थी – परियां, गाड़ियां और लौंडे |

पहले दिन ही सावन का स्वागत हुआ – एकदम सो.बो स्टाइल में |

चल बे, अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखा |

जी |

और कार्ड वापिस चाहिए तो मेरे पैर पड़, तेरा सीनियर हूँ |

सावन झट पैरों में गिर गया |

अबे, मजाक कर रहा हूँ | समझ नहीं आता क्या ?

आता है |

ये सुनकर सीनियर और सावन दोनों हस पड़े और मित्र भी बन गए | पहला दिन अच्छा बीता | क्लास भी पता चल गयी थी – सेक्शन D | जिनका आखरी लिस्ट में नाम आया था उन्हें यही सेक्शन मिला था |

सेक्शन D एक छोटी सी क्लास थी और सावन कुछ अजीब | क्लास में घुसते ही लड़कियों ने सावन पर बातें शुरू कर दी | आदत से मजबुर वो चुप-चाप आखरी बेंच पर जाके बैठ गया | जैसे-तैसे हिम्मत करके उसने अपने आप को लड़कियों से परिचित कराया | एक ख़ास लड़की पे दिल तुरंत – एट थद स्पीड ऑफ़ लाइट – आ चूका था |

दिल प्रेम से भरा था, आवारा था और फ़ोकट भी |

लड़की ने सुंदर ब्राउन मिनी-स्कर्ट पहन राखी थी | आँखों पर चश्मा भी था – कुछ-कुछ सावन के चश्मे जैसा ही |

लड़की का नाम था नाज़ |

कुछ बातें तो हुई पर नाज़ सिर्फ इंग्लिश में बात करती थी और सावन ज़्यादातर हिंदी में | बर्गर और वडा-पाव जैसा कुछ मेल-मिलन हुआ पर नाज़ का दिल अभी धड़का नहीं था | वो तो एक पॉश इलाके के पॉश स्कूल से आई थी और सावन टपोरी इलाका – घाटकोपर – से आया था |

पर आ ही गया था |

सावन इकोनॉमिक्स में होश्यार था और नाज़ होश्यारी में – उस साल वो कॉलेज की रोज़ क्वीन भी बनी |

धीरे-धीरे बातों का सिलसिला बढ़ा | इकोनॉमिक्स के नोट्स घर और दिल बदलने लगे | पर वो दिन जिसने सावन की जिंदगी बदल थी थी, वो एक हिंदी फिल्म की बरसाती रात तो नहीं पर दिन जैसी कुछ था | बारिश बोहोत थी पर सावन जैसे-तैसे कॉलेज आ ही गया | नाज़ तो पास में ही रहती थी, वो भी आ गयी |

सावन, यार इतनी बारिश में कैसे पहुँच गए ?

बस तेरा प्यार मुझे खींच लाया, नाज़ |

क्या ?

नहीं, कुछ नहीं |

इस बात ने सावन को पुरे कॉलेज में सुपर-मैन बना दिया था | इतनी की इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर ने फाइनल परीक्षा में एक एक्स्ट्रा परसेंट देने का वादा कर दिया |

कॉलेज खत्म होते ही सावन ने नाज़ को कैंटीन जाने का प्रस्ताव दिया | नाज़ ने भी तुरंत – एट थद स्पीड ऑफ़ लाइट – प्रस्ताव स्वीकार कर लिया | शायद, दो दिल एक साथ धड़कने लगे थे, शायद, धड़कन धडकना सीख रही थी |

दोनों ने कैंटीन का एक कोना पकड़ लिया | सावन कॉलेज की सबसे सुंदर लड़की के साथ बैठा था |

मुझे इकोनॉमिक्स के सिलसिले में कुछ सवाल है तो मैं तुमको कब फ़ोन कर सकती हूँ ?

तुम मुझे अपना टेलीफोन नंबर दे दो, मैं खुद करूँगा |

हाँ लो, ५१२७२०२ |

आज शाम पांच बजे कॉल करूँ ?

येस डिअर |

कुछ देर मिएँ दोनों कैंटीन से निकल पड़े | नाज़ गहर चली गयी और सावन टॉयलेट |

अंदर घुसते ही “येस” ऐसा ज़ोर से अपने आप से चिल्लाया | जिंदगी में पहली बार किसी लड़की का टेलीफोन नंबर मिला था | ख़ुशी से पागल हो चूका था और बाकी सारा दिन पांच बजने की राह तकता रहा |

पांच बजते ही दोनों ने बातें शुरू की | खूब बातें हुई, अंतहीन बातें हुई | उसके बाद हर शाम यही अंतहीन बातें वाला सिलसिला शुरू हुआ | उसे बाद तो दोनों पक्के दोस्त बन गए |

समय भी बड़ा बलवान है और तेज़ भी | प्रेम से भरे दिलवालों के लिए तो समय नटखट और निर्दयी भी होता है | ये साल धीरे चले एसा सावन चाहता था अपर साल तेज़ी से – एट थद स्पीड ऑफ़ लाइट – गुज़र गया |

जूनियर कॉलेज का आखरी दिन पास था पर सावन अपाने दिल की बात नाज़ से कह नहीं पाया था | पर कहता क्या ? उसे खुद ही नहीं पता था की दिल में जो चल रहा था वो असल में है क्या – प्रेम, मित्रता या वासना ? या कुछ और ही ?

जूनियर कॉलेज का आखरी दिन आ ही गया | सावन ने यादगार के लिए सबके ऑटोग्राफ अपनी सफ़ेद टी-शर्ट पे लिए |

नाज़ ने ठीक दिल पे ऑटोग्राफ दिया पर नाम नहीं लिखा, सिर्फ ५१२७२०२ लिख दिया |

दिन खत्म हो चूका था | रात घनी और जवान हो चुकी थी | रात में दोनों एक दुसरे को थैंक्स बोलने के लिए फ़ोन किया | दोनों बात करते-करते रोते भी रहे |

क्या पता के फिर अगले साल एक क्लास में हो ना हो ?

एसा सोचते-सोचते सावन की आँख कब लग गयी पता ही नहीं चला और वो फिर जूनियर कॉलेज की यादों में खो गया |

अगले दिन सुबह-सुबह घर के दरवाज़े पे घंटी बजी | सावन धीरे-धीरे दरवजे की और बढ़ने लगा | आँख अभी गीली ही थी | देखा तो कूरियर-बॉय कुछ सामान लेकर आया था | बड़े ही आश्चर्य से उसने सामन ले लिया |

देखा तो एक ग्रीटिंग-कार्ड था |

ग्रीटिंग-कार्ड पे आँखें जैसे गढ़ ही गयी थी | रोते-रोते ग्रीटिंग-कार्ड पे लिखा संदेश पड़ता रहा – हैप्पी ५०th बर्थडे; फ्रॉम ५१२७२०२ |

 

छमिया बास्टर्ड

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ठीक रात को दस बजे के आस-पास – हमेशा की तरह – सोनु उर्फ़ फॉरटीस ने अपने टपोरी दोस्त गुल्लू के साथ सनम बार में एंट्री ली | फिल्म घातक का – कोई जाए तो ले आये – गाना जोर से बज रहा था | सनम बार फुल रंग-बिरंगी सुंदर नाचती हुई सनमों, धुएं और टेबल पर बैठे रंगरसियों के फेके नोटों से भरा हुआ था |

सोनु चालीस के ऊपर का हो चला था तो दोस्तों ने प्यार से फौर्टिस नाम रख दिया था | पर दिल तो अभी सोलह वाला ही था |

वही दिल, जो बाला यानि के बार बाला – मोना – पर आ चुका था |

ये बात तो सारा झिलमिल शहर जानता था | और जाने भी कैसे ना ? शहर भी तो छोटा ही था और ऊपर से सनम बार ने और रौनक लगा दी थी | एक तरफ शहर में कोई हसीना कातिल की वारदातें और एक तरफ, ये एक तरफा इश्क |

उफ़ !

उस पर अभी नया-नया जासूसी का भी भूत चढ़ा था | थोड़ी सी कीमत ले कर उसने पीछा करने का काम शुरू किआ था और एक ताज़ा ऑर्डर मिल भी गया था – श्रीमती गुप्ता के पति का पीछा करने का | श्रीमती को शक था के गुप्ताजी किसी बार बाला के प्रेम में है |

सोनु उर्फ़ फॉरटीस और गुप्ताजी की प्रेम कहानी की हीरोइन एक ही थी – मोना | काफी तगड़ी फीस भी मिल चुकी थी |

सोनु और गुल्लू ने बार में एंट्री ली |

अबे डीजे, गाना बदल दे |

गाने वाले को सौ का नोट देते हुए स्टाइल से सोनु ने कहा | गाना तो बदला नहीं पर डीजे के चेहरे का रंग खिल उठा |

यार फॉरटीस, आज तो बोल ही दे मोना को |

हम्म्म्मम्म्म्म, सोच तो मैं भी रहा हूँ गुल्लू पर कुछ गड़बड़ हो गयी तो ? आखिर सब की सब बिकाऊ होती है |

अरे छोड़ यार, इतने सारे नोट देखकर कोई गड़बड़ नहीं करेगी वो छमिया | सब बिकाऊ नहीं होती |

यार धीरे, अगर वो हसीना कातिल – छमिया बास्टर्ड – ने सुन लिया था तो खैर नहीं | सुना है, सामान ही निकाल देती है वो |

अबे, जाने दे ना यार गुल्लू | अपने को क्या ? ये सब की एक ही कहानी है | सब की सब बिकाऊ होती है पर अपनी छमिया की बात अलग है |

सच ?

हाँ गुल्लू, आज रात तो गेम बजा ही दूंगा | तु देखता जा बस | आज की रात कातिल है |

मोना का आगमन हुआ | सोनु ने अपने करारे नोटों की गद्दी निकल ली और उसे इशारे से अपने पास बुलाया | सौ के एक नोट की अंगूठी बनायीं और उसकी बायीं हाथ की विवाह ऊँगली में पहना दी |

ज़ालिम, कब तक तडपायेगी ? आज मेरे साथ चल, रात का सीन बनाते है होटल में |

पैसे लाया है क्या लुक्खे ?

ये देख चमिया, पूरे पचास हज़ार है |

मोना को ये बात-चीत का तरीका पसंद नहीं था पर शाम जवान थी और नोट करारे थे | थोड़ी देर में वो बार के सेठ को बोलकर फॉरटीस के साथ बाहर चली गयी | गुल्लू अभी अंदर ही बैठा दस-दस के नोटों की बरसात करता रहा |

दोनों एक ऑटो-रिक्शा में बैठकर पास के डायमंड पार्क होटल में चले गए | रूम नंबर फिक्स था – २०१ | अंदर आते ही कुछ बातों, कुछ शराबों का, कुछ झींगा-झांगी का सिलसिला शुरू हुआ | पर ज़्यादातर बातें ही हुई |

मोना, देख…

क्या ?

अबे, बोल रहा हूँ ना | आई लव यू |

क्या !?

हाँ, आई लव यू | कबसे तेरे चक्कर काट रहा हूँ | मैं पागल हो चूका हूँ | अब तेरे बिना रहा नहीं जाता |

तो करना क्या है ? शादी करेगा मुझसे ?

वो बाद में देखते है, पहले दूसरी बातें कर लें ?

मतलब ?

होटल मैं पूजा करने तो नहीं लाया तुझे मैं | पर हाँ, कुछ बात करनी है |

देख बे फॉरटीस…

ए, सोनु नाम है मेरा |

हाँ तो मैं भी मोना हूँ, छमिया नहीं |

हाँ-हाँ, पर है तो वही ना |

वो मुझे तुम जैसों ने बनाया है | मैं तो सिर्फ नाचके अपना घर चलती हूँ |

सिर्फ नाचके ? तेरा गुप्ताजी के साथ क्या चक्कर झी ? बड़े-बड़े सेठों को फसाती है ?

नहीं | वो खुद ही मेरे पीछे-पीछे बार में आता है | मेरा कोई चक्कर नहीं उसके साथ |

चल झूठी | तेरे जैसी लड़कियों का यही काम है, मैं सब जानता हूँ | बचपन से बारों के चक्कर काट रहा हूँ |

मैं झूठ नहीं बोलती | मैं सिर्फ पैसों से प्यार करती हूँ, लोगों से नहीं और तुम्हारे जैसे लोगों की गंदी सोच के लोगों ने मुझे बार बाला बना दिया | पर अब बस, मैं अपना घर बासाना चाहती हूँ |

तो चल आजा, फिर आज हनीमून शादी पर वो श्रीमती गुपता ने पचास हज़ार दिए है गुप्ताजी के बारे में पता करने के लिए | और वो कमीना तो तेरे ही गार्डन का भवरा बना फ़िर रहा है |

मुझे पता है |

तो अब क्या करना है ?

तू एक काम कर, श्रीमती गुप्ता को बोल के सुबह ही होटल डायमंड पार्क आ जाये और आते ही तो उनको सारी बात बता दे | उनको बोल दे की गुप्ताजी कोई छमिया नाम की बार बाला के प्रेम में है, थोड़े और पैसे दो तो और पता लगाता हूँ | फिर हम यहाँ से भाग जायेंगे |

इतनी बात करके और एक डबल लार्ज व्हिस्की का पेग लगा के, फॉरटीस ने बत्ती बुझा दी और मोना पे भूखे कुत्ते की तरह झपट पड़ा |

रात तो शायद सुंदर ही बीती दोनों की |

सुबह हुई ही थी के होटल डायमंड पार्क के लॉबी में पुलिस का घेरा था | रूम २०१ में श्रीमती गुप्ता कोने में पड़ी रो रही थी और सोनु उर्फ़ फॉरटीस की खून से सनी लाश पड़ी थी |

शरीर का वो हिस्सा कटा हुआ था |

बास्टर्ड |

ऐसा कहकर, सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर ने लाश के बगल में पड़ी चिट्ठी उठाई, जिसमें एक लाइन लिखी थी |

जैसी है दुनिया वैसी नहीं दिखती है, उस से प्रेम मत करना जो बिकती है, तुम्हरी: छमिया बास्टर्ड |

तीन बजे वाला थप्पड़

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रात आधी जली, आधी बुझी सी थी | जैसे सूरज पर किसी नटखट कमीने ने पानी डाल दिया हो ना, एकदम वैसी | ग्रांट रोड रेलवे स्टेशन के नेमप्लेट के नीचे, अपने नकली जे.बी.एल. के हेडफोंस में नाइनटीस के कुमार सानु के गाने सुनते-सुनते, साहिल ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था | कम से कम लग तो ऐसा ही रहा था |

देर रात हो चुकी थी | अँधेरा तो शहर को पकड़ चूका था पर साहिल ने अब तक ट्रेन नहीं पकड़ी थी | बस अपना सर आगे-पीछे हिला रहा था – मस्ती में बैठे-बैठे ही झूम रहा था | शायद खाली ट्रेन की फिराक़ में था |

एक खाली ट्रेन आई तो थी, पर उसके पहले सज-धज के एक सुंदर लड़की आयी और उसके बगल में आकर बैठ गयी | क्या लाल लिपस्टिक, क्या मिनिस, क्या गोरा रंग और क्या जवानी – एक साथ ब्यूटी का बम्पर पैकेज लग रही थी और पूरा ध्यान सिर्फ अपने स्मार्ट फ़ोन की ओर था |

साहिल को तो नमकीन जवानी का जोश था ही ऊपर से ये भी जलवा हाथ लग गया | शायद उसने मौके पे चौका मारने की सोच ली थी | सेक्शन गरम हो चूका था |

“हाय” कहके बात शुरू तो की पर लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया | फिर याद आया की हेडफोंस तो निकाले ही नहीं | हेडफोंस निकाला और फिर ट्राई किया |

हाय |

कुछ बात तो बनी पर एक ट्रेन ज़ोर से आवाज़ करती हुई प्लेटफार्म से निकली और लड़की ने क्या कहाँ कुछ पल्ले ही नहीं पड़ा |

एक खाली ट्रेन आयी | लड़की उस ट्रेन के लेडीज फर्स्ट क्लास डिब्बे में चढ़ गयी और “शिट यार” ऐसा मन में सोच के साहिल ट्रेन के लेडीज डब्बे के ठीक साथ लगे जेंट्स फर्स्ट क्लास डिब्बे में चढ़ गया | वो ट्रेन में चढ़ गया और उसकी आँखें उस सुंदर लड़की पर गड गयी |

हिंदी फिल्म रंग का गाना – तुम्हें देखें मेरी आँखें, इसमें क्या मेरी खता है – लूप में साहिल के नकली जे.बी.एल. के हेडफोंस में बज रहा था और वो बार-बार उस लड़की की और देखता और फिर अपने स्मार्ट से भी स्मार्ट फ़ोन में घुस जाता |

पर वो ये नहीं जानता था की वो लड़की भी उसे देख रही है |

लोकल ट्रेन अपने मस्ती में सन-सन करके एक स्टेशन से दुसरे स्टेशन पहुँच रही थी | सिर्फ एक बार उन दोनों की आखें टकराई | दोनों दिल कुछ ऐसे धडके की अगले ही स्टेशन पे दोनों उतर गए | लड़की उतरते ही ऑटो-रिक्शा स्टैंड के पास भागने लगी | साहिल भी बेशर्मों की तरह उसके पीछे भागने लगा | पता नहीं उस पर इस बार कौनसा जानवर सवार था ?

लड़की झट से एक ऑटो-रिक्शा मैं बैठी और चल दी | साहिल ने भी हाथ-पैर जोडकर एक ऑटो-रिक्शा वाले को उसका पीछा करने के लिए मना लिया | क्या सीन था – एकदम सुपर फिल्मी | लड़की का ऑटो-रिक्शा एक सुनसान जगह पर रुक गया और साहिल ने शायद इशारा समझ लिया और अपना ऑटो-रिक्शा भी रुका दिया |

लड़की ऑटो-रिक्शा वाले को पैसे देकर आगे चलने लगी | साहिल पीछे-पीछे कुत्ते के जैसे धीरे-धीरे भागने लगा |

अंजली सुनो, प्लीज़ रुक जाओ |

क्या है साहिल? क्यों मेरा पीछा कर रहे हो? मैं कबसे देख रही हूँ |

हाँ, मुझे तुमसे बात करनी है, इसलिए पीछा कर रहा हूँ |

बात करते-करते साहिल ने अंजली का हाथ पकड़ लिया | दोनों बोहोत गुस्से में लग रहे थे | रात काफी हो चली थी | चारों तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा था पर दिलों में बिजली की गडगडाहट काफी ऊंची थी |

अब क्या है साहिल, फिर से क्यों आ गए तुम ?

अंजली यार…

मैं तुम्हारी यार नहीं हूँ |

हाँ बाबा, सॉरी, अंजली, पिछली बार तुमने मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया | सब एकदम अचानक खत्म हो गया |

हाँ तो ?

मैंने अपनी गलतियों को रियलआईज़ कर लिया है | मैं समझ चूका हूँ | तुम्हे भी और खुद को भी |

साहिल, मुझे तुम्हरे सार ड्रामे पता है, स्टॉप दिस और भाग जाओ यहाँ से | समझ लेते तो पहले ही आ जाते | अब याद आई ?

हाँ अंजली, आ जाता पर हिम्मत नहीं हुई | और याद तो बोहोत आयी |

हाँ, वो बिस्तर वाले लम्हों की ही याद आयी होगी तुम्हे ?

नहीं अंजली, याद सब कुछ आया, हर पल, हर लम्हा पर सामने आने की हिम्मत नहीं हुई |

दोनों में काफी देर बातें चली और अचानक अंजली ने साहिल के दाहिने गाल पर एक कस के थप्पड़ जड़ दिया |

कुछ देर तक दोनों एक दुसरे को देखते रहे और फिर अंजली वहां से चली गयी | थोड़ी दूरी पर उसका किराये का मकान था | साहिल सर झुकाए, नीचे वाले होंठ को दबाये, अपने स्मार्ट से भी स्मार्ट फ़ोन में घुस गया | टाइम देखा – तीन बज चुके थे |

साहिल निराश था | सालों बाद अपनी गलतियों का एहसास हुआ था और उन गलतियों की माफ़ी मांगने की हिम्मत हुई थी | अंजली तो अचानक ही रिश्ता तोड़कर चली गयी थी | उन दोनों में क्या हुआ था ये तो सिर्फ उन दोनों ही पता था पर उलझन को सुलझाने की पहली पहल सहिल ने की थी | उसे लगा था की पूरी कहानी सुनने के बाद शायद अंजली का दिल बदल जायेगा पर अफ़सोस, ऐसा हुआ नहीं |

रात की खामोशियों में आधी-अधूरी कोई पुरानी कहानी पूरी करने की कोशिश हुई, कुछ बातें मैली और कुछ क्लियर हुई | रात की खामोशियों में शुरुआत का दी एंड और दी एंड की शुरुआत हुई |

थप्पड़ तो बोहोत करारा था, काश मैंने भी एक लगाया होता तो उसका भी दिमाग ठिकाने आया होता |

ऐसा सोचते हुए साहिल ने फिर अपने नकली जे.बी.एल. के हेडफोंस सर पर लगाये और नाइनटीस के कुमार सानु के गाने सुनते-सुनते ऑटो-रिक्शा की तलाश में लग गया |

बड़ी मुश्किल से एक ऑटो-रिक्शा मिला और बैठते ही एक एस.एम्.एस. आया – प्लीज़ कम होम | आई एम् सॉरी |