अकाल, अनाद, अरूप

वह कहते है मुझसे कि मूर्ति नहीं रखते हो ?
क्या भाई, इश्वर पर विश्वास नहीं रखते हो ?
मैं कुछ यह कहता हूँ  कि,
अकाल, अनाद, अरूप,
यही मेरे ख़ुदा का रूप |

हर राह में राह है,
हर जगह अल्लाह है,
वह है हर जगह, उसका ही वंश इंसान है,
उस कृपालु को मूर्तियों, किताबों में क्या ढूँढना ?
कण-कण में है भगवन है |

अगर दया में तू लय हो,
अगर प्रार्थना में वास हो,
दर्शन हर क्षण होंगे उसके,
अगर मन सूफी हो और,
शुद्ध धर्म में विश्वास हो |

मैं उनसे यह कहता हूँ कि जागो, आँखें खोलो,
उसे ऊपर-नीचे ना खोजो, बस उसके साथ होलो |
कोई नहीं ज्ञानी यहाँ, कोई नहीं आलिम,
भले कम बोलो पर हमदर्दी से बोलो |

श्रम करो, कर्म करो,
नहीं मिलती छाव भी बिना धुप |
अकाल, अनाद, अरूप,
यही मेरे ख़ुदा का रूप |

4 thoughts on “अकाल, अनाद, अरूप

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