एक मुट्ठी राख

छोटा सा जीवन है,
छोड़ो घमंड जब होना है ख़ाक |
तुम कौन हो ?
एक मुट्ठी राख |

ना मैं कुछ, ना मेरा कुछ,
समझ गया मैं ये बात |
मैं कौन हूँ ?
एक मुट्ठी राख |

एक पल में शुन्य हो जायेगा,
जो बनता है बेबाक |
वो कौन हैं ?
एक मुट्ठी राख |

कब शुरू, कब खत्म,
ना मिलेगा जिंदगी का सुराग |
हम कौन हैं ?
एक मुट्ठी राख |

6 thoughts on “एक मुट्ठी राख

  1. बचती है सिर्फ एक मुट्ठी राख…

    और जो है मेरे साथ
    पर नही है आते हाथ…

    सुरज का तेज,
    अग्नि क ताप,
    सांसो की माला,
    प्राण की लीला,
    जल का सागर,
    आकश का विस्तार,
    मन की शक्ति,
    चित्त की भक्ति,
    ब्रह्म की अभिव्यक्ति…

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