फ़िल्मी बात

जब दिल से शोले निकलते है,
आग के गोले निकलते है,
शहेंशाह भी अग्निपथ पे चल निकलता है |

सुनसान राहों पर,
अपने पैर की ज़ंजीर को,
दिल की हथकड़ी को,
अपनी ज़िन्दगी का सिलसिला बना लेता है |
कोयला से हिरा निकलता है,
और अपनी तकदीर ख़ुद बनाता है |
ख़ुदा गवाह है !

जब पाप की आंधी चलती है,
जब तूफ़ान आता है,
कोई मिस्टर इंडिया,
तेज़ाब और घातक बन जाता है |

इसे ही कोई दीवाने को,
जब पत्थर के फुफूल मिलते है,
सीने पे त्रिशूल चलते है |
कोई राह नज़र नहीं आती |
कोई मंजिल नज़र नहीं आती |
जब मोटा लगान चुकाना पड़ता है,
आनंद मिथ्या हो जाता है,
तब कोइ प्यासा यलगार करता है |
इसमें दिल का क्या कसूर ?

काश ! वो एक रका हुआ फैसला हो जाए |
दुनिया से गोलमाल निकल जाए |
काश ! सीने में दो दिल हो,
काश ! आँखें खुल जाएँ,
ख़ुदा कल लिए एक ग़दर हो,
ताकि कोई मोहरा ही ना रह जाए |
ताकि कोई कोहरा ही ना रह जाए |

2 thoughts on “फ़िल्मी बात

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