इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ

कुछ फुल सुहाने लाया हूँ |
तुम्हे मनाने आया हूँ |
मैं जानता हूँ के तुम कौन हो,
इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ|

शर्माओगी तो ज़रूर,
लाज़मी है|
घब्राओगी भी थोडा,
शायद !
पर सुरूर तो बोहोत आयेगा जनाब,
तुमको, तुमसे थोडा सा चुराने आया हूँ|
इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ|

बोहोत अर्ज़ा बीत गया है|
तू मुझसे जीत गया है|
पर अब इश्क की किताब को पढ़े,
एक ज़माना बीत गया है|
चलो, फ़िर से एक बार,
चलो ना !
फ़िर वो प्रेम-साज़ बजने आया हूँ|
इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ|

मैं तो अब यही हाल है, यार अजब,
बेहोश हूँ !
खामोश हूँ !
मदहोश हूँ !
पर, कहीं शायद जिंदा हूँ|
तुझे याद करने के बहाने आया हूँ|
इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ|

 

2 thoughts on “इसलिए ये ग़ज़ल सुनाने आया हूँ

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