रोज़ उनसे मुलाक़ात

रोज़ उनसे मुलाक़ात होती है |
कैसे हो अजब—बस यही बात होती है |

तर्क-ए-तालुकात ही है लेकिन,
ना उनकी, ना हमारी रात सोती है |

जहाँ हज़ार दिलों की लाश गिरी हो |
वहीँ मोहब्बत की शिनात होती है |

मेरा घर मिटटी का है इसलिए,
मेरे ही यहाँ बरसात होती है |

सबसे ज़्यादा फैज़ हो बाज़ार में,
असली गुहर की यही ज़ात होती है |

नहंग के आंसूं ना बहाओ,
शीशे की क्या बिसात होती है ?

मेरे ग़ज़लें ही है मेरा धर्म,
कोई नहीं होता, तो ये साथ होती है

पहना देना मुझे रुखसत पे,
यही शायर की जवाहरात होती है |

 

11 thoughts on “रोज़ उनसे मुलाक़ात

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