वो कौन थे ?

मेरठ से आई रेलगाडी पांच घंटे लेट थी | दिमाग और मौसम वैसे ही ख़राब था उस पर कोयल की फूटी किस्मत – मुंबई बंद |

यहाँ नयी जॉब से दिल में ठंडक आई थी और पता नहीं क्या हुआ, पुरा शहर जल रहा था | जैसे शमशान में मुर्दे जलते है ना, एकदम वैसे | ना जाने किसने माचिस जलाई थी | ना जाने किसने ये आग फैलाई थी |

कोयल पहली बार इस खूंखार शहर – जिसे लोग सपनो का शहर कहते है – आई थी | एकदम बौखलायी सी थी, सारा माहोल देख कर |

रेलवे स्टेशन से बाहर का सीन एकदम बिल्ला था |

घोर रात थी और बिना सर के धडों की एक भीड़ बाहर खड़ी थी | उस पूरी भीड़ का कुल आई. क्यू. रूम टेम्परेचर से भी कम रहा होगा | भीड़ का एक समंदर रेलवे स्टेशन के अंदर था और एक सैलाब बाहर लीच की तरह लोगों के बाहर आने की मानो प्रतीक्षा कर रहा हो | ये वो निकले, और ये वो उनका खून चूस लें |

सेक्शन गरम था |

लोग बेकाबू हुआ पड़े थे | चारों और आग ही आग थी, दंगा ही दंगा था, शोर ही शोर था | क्या हुआ था किसीको नहीं पता पर हर कोई ओनी एक्सपर्ट राय मुफ्त में बाँट रहा था |

प्यारी कोयल बोहोत डरी हुई थी पर पिताजी फौजी थे और उन्होंने कभी ना डरने की ट्रेनिंग बचपन से दी थी अपनी लाडली को | तो वो सारी ट्रेनिंग और ज्ञान समेत कर, लोगों से धक्का-मुक्की करके बाहर जाने की कोशिश करती रही |

पर भीड़ से तो ख़ुद नारायण भी कतराते है, क्या फौजी का ज्ञान, क्या आम आदमी ?

ए लड़की, दीखता नहीं क्या बे तुझे ?

सॉरी अंकल, गलती से धक्का लग गया |

पर मुझे मज़ा आया |

क्या कहा आपने ?

जा बे, अपना काम कर |

कोयल बुरा नहीं मानी | अश्लील बातों की उसे आदत थी | अपना इलाका होता तो फिर भी एक चपेड मार कर मामला निपट सकता था पर ये शहर बिलकुल नया था | वो फिलहाल चुप ही रही |

भीड़ अब बेचैन और बेकाबू हो चली थी | धक्का-मुक्की बढ़ने लगी | लोग औरतों, बच्चों और बूढों का ख्याल भूल गए | इस झल्लाए हुई भीड़ में ना जाने कितने गंदे शरीर कोयल को छू गए, ना जाने कितनी गंदी आँखें उसके कपडे के पार चली गयी और ना जाने कितने हाथ इधर-उधर उसके तन पे फिसल गए |

रात अभी काली थी |

शायद, इस रात की कोई सुबह है भी नहीं |

उतने में पुलिस की एक टुकड़ी रेलवे स्टेशन पे पास आयी और बताया की शहर में तनावपूर्ण शांति है | इसका मतलब तो कोयल की समझ में नहीं आया पर ये ज़रूर आया की सपनों का ये शहर आज सोयेगा नहीं, रात भर जागेगा और जगायेगा |

बेचारी भोली थी, कर्फ्यू के जानवर से बिलकुल अनजान |

रेलवे स्टेशन पर कहीं सिसकती आँखे थी, कहीं उदास चेहरे तो कहीं हंगामा | कहीं घडी में बार-बार टाइम देखते लोग थे तो कहीं सुखे-भूखे कुत्ते | पुलिस बार-बार सबको अंदर ही रहने की सलाह दे रही थी |

बाहर बिना सर के धडों की भीड़ ने काफी गाड़ियाँ जला के राख कर दी थी और अपने हाथ में बोतल और पत्थर लिए अगला शिकार की तलाश में थे – शांति से |

एकदम शांति से |

अचानक कहीं से आवाज़ आई और बात करने लगी | जैसे भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती, शायद, उसकी कोई एक प्रकार की आवाज़ भी नहीं होती | ना कोई शक्ल दिखी ना कोई आहट हुई | मानो जैसे खुद शहर ही बात कर रहा हो | काल्पनिक है पर हुआ ठीक ऐसा ही |

उस बेशक्ल की आवाज़ ने सबको चौका दिया |

आज बंद है | आज मेरा शहर बंद रहेगा पर चकला चालु रहेगा | कचरा फेकना चालु रहेगा, बलात्कार और छेद-छड चालु रहेगी, धोखा-दड़ी तो कभी बंद होती ही नहीं, गाली-गलोच, तू-तू-मैं-मैं भी चालु रहेगी, कुत्ते भोकेंगे, फूल खिलेंगे और आज फिर रिक्शा वाले कहीं भी जाने के लिए ना ही कहेंगे | यारों, चिंता ना करो | मुंबई हमेशा चलता रहता है, कार्यशील रहता है, रास्ते में रहता है | शहर बंद है तो क्या हुआ, दिल तो चालु है ना ? आग तो बंद नहीं होती – दिल में हो या सडकों पे | कुछ नहीं होगा, चिंता ना करो | शहर में तनावपूर्ण शांति है |

कोयल सोच में पड़ गयी | इस सपनों के शेहर में आते ही एक सपना जैसा ही कुछ दिखयी दिया | ना वापिस जाने का कोई रास्ता था ना आगे जाने का | लोग लोगों को मार रहे थे, तोड़-फोड़ कर रहे थे | अपने ही शहर को बर्बाद करके अपनी किसी सफलता पर जश्न भी मना रहे थे | बस रेलवे स्टेशन के अंदर आना बाकी था जो पुलिस की मेहेरबानी से नहीं हुआ |

नयी जॉब का कल पहला दिन था और रात तो सारी रेलवे स्टेशन ने ही रख ली | मुंबई बंद करने वालों के शानदार तोहफा दिया था | बेचारी यही सोचती रही के आगे का जीवन इस शहर में कैसे निकलेगा |

लोगों ने तो अपना कुछ अलग ही परिचय दे दिया था |

क्या यहाँ लोग ऐसे ही है ? क्या ऐसे ही लोगों से रोज़ पाला पड़ेगा ? क्या यहीं मुंबई है ? इतनी नफरत लोगों के दिलों में आयी कैसे होगी ? कहाँ से आये होंगे ये लोग ? क्या यहीं मुंबई है ?

सोचते-सोचते भोर होने वाली थी | ना जाने कहाँ से आए वो बिना सर के धडों की भीड़ ना जाने कहाँ को चली गयी |

शहर अध-जला सा हो चुका था | बाहर पत्थर, शराब की खाली बोतलें, जलते टायर, चिप्स के खाली पैकेट और खून की छीटें बिखरी थी |

बड़ी हिम्मत करके कोयल सबसे लास्ट में बाहर निकली | बाहर कुछ ऑटो-रिक्शा वाले खड़े थे | शहर जाग रहा था, डर भाग रहा था | उसके जान में जान आयी |

भईया, गोरेगांव चलोगे ?

नहीं |

 

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