बहुत कुछ खोया

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बहुत कुछ खोया पर बहुत कुछ पाया ही नहीं |
हर वक़्त का वक़्त आ गया, मेरा वक़्त आया ही नहीं |

क्या देखू मैं कोई और जलवे इस जहान के ?
मैं सैलाब से कभी निकल पाया ही नहीं |

कितने खिलाये मैंने परोस के निवाले उसको,
इसने तो एक टुकड़ा भी कभी खिलाया ही नहीं |

चुन-चुन के दिए थे उसको फूल अजब,
वो कमज़र्फ अपना दिल कभी लाया ही नहीं |

 

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