बाग़म-ए-शाम थी

बाग़म-ए-शाम थी, ना राह-ए-हौसला था |
बस प्यार की याद थी और उनका फैसला था |

फिर भीगी हुई शाम ने पुकारा मेरे होठों को,
फिर सुलगते अंगारों ने पुकारा मेरी चोटों को |

ना, चाह थी, ना चाहतों का सिलसिला था,
आँखों में तूफ़ान और दिल में ज़लज़ला था |

पुकारता रहा यार को मेरे ताहद्-ए-नज़र,
जाने उसने दिया प्यार मैं किस बात का अज़र |

महफ़िल जवान थी, चारों और काफिला था,
सर उठकर देखा तो, बस मेरा ही दिल जला था |

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